Sunday, August 31, 2008

सोचा न था

सोचा तो ये था कि ब्लॉग पर 8 महीने के बाद किसी उम्मीद बंधाती और सकारात्मक पोस्ट के साथ ही पुनर्जन्म होगा। लेकिन करें क्या वो जावेद साहब ने लिखा है न...ग़म नहीं लिखूं क्या मैं ग़म को जश्न लिखूं क्या मातम को,जो देखे हैं मैने जनाज़े क्या उनको बारात लिखूं। सो आज सुबह अख़बार का मुखपृष्ठ देखकर रहा नहीं गया। लगा कि ब्लॉग के ज़रिए ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक ये बात पहुंचनी चाहिए। लगा कि हम विकास का कितना भी ढिंढोरा पीट लें, सोच में आए बदलाव पर इतरा लें पर असल बदलाव से अब भी कोसों दूर हैं। ये दु:ख इस बात से और भी बढ़ जाता है कि जिनके कंधों पर समाज को दिशा देने की ज़िम्मेदारी है या कहें जो ऐसा करने का दम भरते हैं वही सोच के छिछले स्तर पर उतरे हुए हैं। अब ज़रा मुद्दे पर आते हैं। हुआ यूं कि डीपीएस कैम्पस में एक छात्र की स्वीमिंग पूल में डूबने से मौत हो गई। कुछ दिन पहले ही पुष्पांजलि की मौत के बाद आई ये ख़बर बडी बन गई थी सो ठीक ही मुखपृष्ठ पर ली गई। लेकिन ये क्या, दूसरे पैराग्राफ़ की शुरुआत दिमाग़ को झकझोर गई। किसी बड़े और प्रतिष्ठित अख़बार में तो मैने कम से कम ये उम्मीद नहीं की थी। अब पढ़िए क्या है उस दूसरे पैराग्राफ़ में-
नादिर टी-140, सराय काले खां निवासी मोहम्मद रईस का बेटा था। तीन बहनों के बीच नादिर न केवल रईस के घर का, बल्कि पूरे खानदान का इकलौता चिराग था। रईस के दोनों भाइयों के घर भी बेटियां ही हैं। (नवभारत टाइम्स- 30.08.08)
सिर्फ़ दो वाक्यों ने वो ज़ाहिर कर दिया जो अब तक शायद कहीं भीतर रहता तो होगा लेकिन अख़बार में ये सब न लिख पाने की बंदिश के चलते सामने नहीं आ सका था। संपादक का ध्यान या तो इस पर गया नहीं और अगर गया तो शायद उसे कुछ खटका नहीं। जो भी हुआ, बुरा हुआ।
ये कोई साधारण ग़लती या चूक होती तो शायद नज़रअंदाज़ किया जा सकता था लेकिन ये तो सोच समझ कर लिखी गई वो इबारत थी जो दशकों की तरक्क़ी को...पत्रकारिता की भूमिका को मज़ाक बना कर पेश करती है।फ़िलहाल हम धर्मगत विश्लेषण में न जाएं तो बेहतर है क्यूंकि तब इस ग़लती के मायने कहीं बहुत अलग जान पड़ेंगे और ख़तरनाक भी।
ख़ैर, औरों का तो पता नहीं लेकिन मुझे लगता है कि अख़बार को इसके लिए माफ़ी मांगनी चाहिए। माफ़ी इस एहसास के साथ कि हमेशा इस बात का ख़्याल रखा जाएगा कि ग़लती से भी कुछ ऐसा न छप जाए जो बदलते समाज को फिर से सोच के उसी ढर्रे पर वापस लाकर पटक दे।

Saturday, January 5, 2008

आवाज़ बुलंद हो



उठाया है हमने जो पहला क़दम
किया है ख़ुद से वादा ली है क़सम
कि कोई चीख़ कोई आह गुम न हो
आंख डरी न हो चेहरा सहमा न हो
ज़ुबां ख़ामोश न हो सवाल थमा न हो
सच आज़ाद हो उन्मुक्त हो ज़िन्दा हो
जंजीरों में छटपटाता झूठ ख़ुद पर शर्मिन्दा हो
क्यूं न हम एक मशाल बनें
अंधेरे को चीरती लौ विशाल बनें
क्यूं न हम लोगों का विश्वास बनें
हर मुश्किल में उनकी आस बनें
इस सबके बीच ख़्याल बस इतना रहे
ये रास्ता आसान नहीं है
पर नामुमकिन भी तो नहीं
तो साथियों हौसला मंद न हो
आवाज़ सदा बुलंद हों


ये कविता तब लिखी गई थी जब पत्रकारिता की दुनिया में क़दम रखा ही था और तस्वीर के सारे पहलुओं से वाक़िफ़ नहीं था। इस बीच नदी में काफ़ी पानी बह चुका है और कई नई चीज़ों से दो चार भी हुआ हूं लेकिन ख़ुशी इस बात की है कि इन पंक्तियों पर भरोसा पहले से मज़बूत ही हुआ है।

Friday, December 28, 2007

मेरे मोबाइल की आत्मकथा


आप सोच रहे होंगे कि बात करने का यंत्र होकर ये मुझे आत्मकथा लिखने की क्या सूझी लेकिन क्या करूं मालिक का रवैया देख कर रहा नहीं गया और एक रोज़ आत्मकथा एक लंबा सा एसएमएस बना कर ख़ुद को ही भेज दी। ताकि वो उसे पढ़ लें और अपने फ़ैसले पर फिर सोचें। तो ये रहा वो एसएमएस:

आप पर धिक्कार है मालिक जो अब आप मुझे छोड़ने का मन बना रहे हैं। क्या नहीं किया मैने आपके लिए। ख़ुशी हो या ग़म, हर मौक़े पर आप मुझ पर चैटियाये हैं। न जाने कितनी बार ग़ुस्से में थिरकती आपकी उंगलियां एसएमएस बनकर मेरे सीने पर दौड़ी हैं। और न जाने कितनी बार ज़मीन पर गिर कर मेरा अंग अंग कराह उठा है लेकिन फिर भी मैं आपकी सेवा करता रहा। कभी उफ़ तक नहीं की। कॉल रजिस्टर में दर्ज 1254 घंटे, 26 मिनट और 47 सेकंड इसका सबूत हैं। माना कि मेरी वजह से सब आपको चिढ़ाते हैं, मज़ाक बनाते हैं। माना कि आज दूसरों के मोबाइल में ब्लूटूथ है, कैमरा है, इंटरनेट है, संगीत है, बड़ी स्क्रीन है, चार जीबी मेमोरी है। मेरे पास क्या है, क्या है मेरे पास। एक छोटी सी टॉर्चलाइट और आपका कम होता प्यार...बस्स।

पिछले कुछ दिनों से देख रहा हूं। अख़बार और इंटरनेट खंगाल रहे हैं। शायद मुझसे बेहतर साथी की तलाश में। लेकिन कहे देता हूं, अपने जीते जी मैं किसी और को आपकी जेब में बजते नहीं देख सकता। नहीं देख सकता किसी को 'उसकी' तारीफ़ करते हुए। कोई समझता क्यूं नहीं कि कितना मुश्किल है मेरे लिए कल को भूलना।

अभी कल ही की बात लगती है जब मैं घर में आया था। सबको देखते ही भा गया था। भगवान झूठ न बुलाए,सबकी नज़रों में ही उतर गया था। हर कोई एक बार छू लेने को बेताब, कोई रूप पर लट्टू तो कोई फ़ीचर्स पर और कोई तो सफ़ेद रंग का ही गुणगान करने में लगा था। हाथों हाथों पर रहा था। मुझे लगा था कि ये एक लंबे और मुहब्बत भरे रिश्ते की शुरुआत है लेकिन शायद मैं ही कमनज़र था जो अपनी ही आने वाली नस्ल के बढ़ते फ़ीचर्स और घटते अपनेपन को पहचान न सका। जो अब मेरे ही वजूद को मिटा देने पर तुले थे। अब पहले वाली बात कहां। आज हो सकता है आप किसी और मोबाइल को अपना लें लेकिन याद रखिएगा वो सब मेरे जितना प्यार और अपनापन नहीं दे पाएंगे। आख़िर में यही कहूंगा कि आंसुओं से भीगी इस स्क्रीन को जल्दी पोंछो और मेरा साथ छोड़ने की इच्छा दिल से निकाल दो।

बस ये एसएमएस पढ़ कर मेरे दिल ने गवाही नहीं दी कि मैं एक नया मोबाइल ख़रीदूं। मोबाइल ख़रीदने के लिए मेरे पीछे पड़ने वाले दोस्तों, माफ़ी चाहूंगा लेकिन इस करुण प्रार्थना को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता।
35% Off New Products at GoDaddy.com! Expires 4/30/13.