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Tuesday, September 14, 2010

भोपाल लेक पर...उस रोज़



भोपाल लेक में डूबता सूरज
प्यारा लग रहा था उस रोज़
डूबते हुए लाल गोले के
कुछ छींटे तुम्हारे चेहरे पर आ पड़े थे उस रोज़
उस रोज़ तुमने लेक के पानी में
शायद तीन बार उंगलियों से मेरा नाम लिखा था
बोटिंग नहीं की थी हमने उस रोज़
मैने हाथ पकड़ा था तुम्हारा
तुमने घबरा कर हाथ छुड़ाया था उस रोज़
हंस कर कहा था- मैं कहीं भाग थोड़ी रही हूं
मैं भी हंसा था, कहा- ये हाथ ज़िंदगी भर नहीं छोड़ूंगा

वो कॉर्नर वाले रेस्ट्रां की लेक फेसिंग टेबल पर
हमने कॉफ़ी और सेंडविच का ऑर्डर दिया था
वेटर चौंक पड़ा था उस रोज़
जब तुमने बिल पे किया था
उसे क्या पता था कि हमारे दरमियां
फॉर्मेलिटी जैसा कुछ नहीं
बस प्यार है ढेर सारा
उसे शायद आदत नहीं थी ये देखने की
तुम कितना हंसी थीं, उसके चले जाने के बाद
लाल सूरज डूब चुका था अब तक
बस उसकी लालिमा ज़िंदा थी
तुम्हारे चेहरे पर उस रोज़

रेस्ट्रां से निकलते हुए
उस धुंधलके में तुम्हें दिखा था कैंडीफ्लॉस वाला
सड़क के उस पार खड़ा था वो उस रोज़
तुम्हारी पसंदीदा चीज़ों में से एक़
बस..तुम ज़िद्दी बच्चे की तरह
हाथ छुड़ा कर भागी थीं
और
और
ट्रक...टक्कर...ख़ून..शोर
मैं इस ओर सड़क पर ही
गिर पड़ा था
सन्नाटा पसर गया था मेरे कानों में उस रोज़
मैं माफ़ नहीं कर पाउंगा ख़ुद को कभी
मैंने हमेशा हाथ थामे रखने का वादा किया था
क्यूं तुम्हारा हाथ छोड़ दिया फिर
उस रोज़

Sunday, December 20, 2009

हम हैं ख़बरों की दुनिया के नंगे पुरोधा



हां-हां, कहावतें जानते हैं हम भी
हां-हां, रवायतें जानते हैं हम भी
जानते हैं तौर-तरीक़े भी
पर क्या चिपके रहें इन्हीं से हमेशा
होते होंगे पहले हमाम
पर वो हमारा क्या मुक़ाबला करेंगे
हमाम- नाम ही इतना डाउनमार्केट है
अपना तो भैया स्पा है
आधुनिक और सुविधा संपन्न
इसमें डलती हैं नोटों की गड्डियां
और ख़ास सचमारक लोशन
हां, एक बराबरी है हमाम और हमारे स्पा में
हम सब भी नंगे खड़े हैं इसमें

हम हैं ख़बरों की दुनिया के नंगे पुरोधा

अब सुनो हम नंगों का समवेत स्वर
हमारे अख़बारों और चैनलों की
कुछ ख़बरें काल्पनिक हैं
इनका सच्चाई से कोई भी वास्ता
महज़ संयोग है

हमेशा हम पूछते हैं न
ऐसे हालात में कोई हमसे भी तो पूछे
'कैसा लग रहा है' हमें?
सच सुनेंगे
बहुत बुरा लग रहा है
शर्म भी आती है
दरअस्ल ये सब बाज़ार का दबाव करवा रहा है
ग़ालिब से माफ़ी के साथ कहें तो
"हमें तो बाज़ार ने बेईमान बना दिया
वर्ना अख़बार तो हम भी थे सच्चाई वाले"

क्या सोचने लगे
मान ली न हमारी मजबूरी
रहम भी आ रहा होगा हम पर
थोड़ा-थोड़ा

हा हा हा हा हा हा
फंस गए न आप भी
हम ठहरे शब्दों के जादूगर
बरसों से बेच रहे हैं इसी तरह
करतूतों को अपनी
मजबूरी के मज़बूत खोल में लपेटकर

*ये कविता आउटलुक-अंग्रेज़ी के ताज़ा अंक ( For Sale- Journalism) से प्रेरित है।

Monday, November 23, 2009

26/11- शहर के सीने में भी दिल धड़कता है


मैं डरा हुआ हूं, सहमा हूं
मैं ख़ामोश हूं, नाराज़ हूं
मैं वो शहर हूं, जिसमें
हाड़-मांस के इंसान रहते हैं

मैं कभी अजमेर हो जाता हूं
कभी जयपुर, कभी दिल्ली
तो कभी मुंबई
मेरे रिसते ज़ख़्मों को ढंकने के
नायाब इंतज़ाम ढूंढ़े हैं सबने
जब मैं दिल्ली होता हूं तो
वो दिल्ली की दिलेरी हो जाती है
जो कभी मुंबई हुआ तो
मुंबई की स्पिरिट

मेरे ज़ख़्म हरे रहते हैं
उनका इलाज नहीं करता कोई
बस, बे-होशी के कुछ इंजेक्शन
दिये जाते हैं हर बार

और मैं फिर तैयार हो जाता हूं
अगला हमला झेलने के लिए

एक बरस हुआ, जब मैं मुंबई था
मैं एक शहर हूं
मेरी ज़िम्मेदारी है
यहां रहने वालों की हिफ़ाज़त
इस एक साल में जो कुछ बदला
उससे मैं मुतमईन नहीं हूं
हां, ग़मज़दा ज़रूर हूं

अपने बाशिंदो से मैं
ये वादा करना चाहता हूं कि
वो अब महफ़ूज़ रहेंगे
क़त्लो-ग़ारत का कोई मंज़र
उन्हें छू तक नहीं सकेगा
उनके बच्चे यतीम नहीं होंगे
किसी मां के आंसू निकलेंगे
तो अपने बच्चे का
पहला क़दम उठता देखने की ख़ुशी से
उसकी आख़िरी चीख़ सुनने के बाद नहीं
किसी बाप को अपने बेटे को कांधा नहीं देना होगा
उस कलाई पर राखी हर साल सजेगी
ये सब कहना चाहता हूं मैं
अपने बच्चों से, अपने बाशिंदों से

पर कहूं कैसे
जानता हूं ये सच नहीं है
उन्हें ख़ुश देखने के लिए मैं झूठ बोल भी दूं
लेकिन फिर सोचता हूं कि
जब सच बेपर्दा होगा
तो उनका
अपने शहर से भरोसा उठ जाएगा

मैं ख़ुद नहीं समझ पा रहा
मेरी चुप्पी मेरी मजबूरी है
या मेरी कमज़ोर याद्दाश्त का नतीजा
ये जो कुछ है
है बहुत डरावनी

Sunday, September 13, 2009

सुनो, तुम्हारी आंखों में मेरे कुछ ख़्वाब पड़े हैं


मैं जब भी देखता हूं तुम्हारी आंखें
थोड़ा डर सा जाता हूं
पता नहीं इनमें से
कितने, पूरे कर सकूंगा
हां, मैं तुम्हारी इन आंखों में
हर पल बुनते
हज़ार ख़्वाबों की ही बात कर रहा हूं
सुनो
जो कभी मैं न पूरा कर सका कोई ख़्वाब
तुम मुझसे रूठ तो नहीं जाओगी
तुम मुझे छोड़ तो नहीं जाओगी
हां-हां, मैं जानता हूं
हम
प्यार में हैं
ये नहीं है कोई सौदा
जिसमें लेन-देन हो
पता नहीं
फिर क्यूं डरता हूं

मेरे इस डर को दूर करने के लिए
तुम्हें एक वादा करना होगा
एक छोटा सा वादा

तुम ख़्वाब हमेशा
मेरी आंखों से देखोगी
और मुझे...
जब भी देखने होंगे ख़्वाब
कहूंगा तुमसे
सुनो,
तुम्हारी आंखों में मेरे कुछ ख़्वाब पड़े हैं

Sunday, August 2, 2009

आरा मशीन पर रख दो सारे ग़म

कंस्ट्रक्शन का बूम है
कुछ तो फ़ायदा उठा लो
मेरी मानो
आरा मशीन पर रख दो सारे ग़म
एक-एक ग़म
बेमौत मरेगा
टुक़ड़े-टुकड़े
यहां-वहां गिरेगा
रह जायेंगी बस ख़ुशियां
समेट के सारी
ख़ुशियां प्यारी
ग़म की दीवार ढहाओ
इमारत बुलंद बनाओ

Wednesday, July 29, 2009

मैं थक गया हूं, ज़हानत का ये नक़ाब ओढ़े-ओढ़े


मैं थक गया हूं
ज़हानत का ये नक़ाब ओढ़े-ओढ़े
करना कुछ चाहता हूं
करना कुछ पड़ता है
वरना लोग कहेंगे
देखो, कैसा जंगली है
लेकिन बहुत हुआ
मुझे अब परवाह नहीं किसी की
मैं सच कह रहा हूं
नोंच के फेंक दूंगा इसे
क्यूंकि

मैं थक गया हूं
ज़हानत का ये नक़ाब ओढ़े-ओढ़े

मैं सभरवाल के हत्यारों को
चौराहे पर लटकाना चाहता हूं
चाहता हूं हरेक नेता को
कुछ दिन के लिए सीमा पर भेजना
मैं विधानसभाओं और संसद में
कामकाज ठप करने वालों पर
लाइव कोड़े बरसाना चाहता हूं
मैं जागते हुए भी सोने का नाटक करने वालों को
उठाना चाहता हूं
मैं सच कह रहा हूं
मैं किसी भी पल ये कर सकता हूं
क्यूंकि

मैं थक गया हूं
ज़हानत का ये नक़ाब ओढ़े-ओढ़े

मैं मिलावटख़ोरों को
मिलावटी मौत से अपंग बनाना चाहता हूं
चाहता हूं नक़ली नोट बनाने वालों की
चमड़ी के सिक्के चलाना
मैं बलात्कारियों को
भूख़े शेर के पिंजरे में छोड़ना चाहता हूं
मैं सच कह रहा हूं
अब इन इच्छाओं को दबाऊंगा नहीं
क्यूंकि

मैं थक गया हूं
ज़हानत का ये नक़ाब ओढ़े-ओढ़े

मैं दंगा कराने वाले आक़ाओं के
अपनों के गले में जलते टायर डालना चाहता हूं
चाहता हूं आतंकवादियों के रिश्तेदारों को
उनकी आंखों के सामने छलनी करना
मैं माहौल में घुला ज़हर
सोखना चाहता हूं
मैं सच कह रहा हूं
मुझसे ये सब होके रहेगा
क्यूंकि

मैं थक गया हूं
ज़हानत का ये नक़ाब ओढ़े-ओढ़े

Tuesday, July 28, 2009

माउंट एवरेस्ट उसी का है !


अस्सी बरस से ज़्यादा हुए
वक़्त पर पड़ी बर्फ पिघली तो सही
हमें माफ़ कर देना, मैलरी
हम गुनहगार हैं तुम्हारे
कई पीढ़ियों के भी
लेकिन हम क्या करते
इतिहास सुबूत मांगता है
और दुनिया ने देखा था
सिर्फ एडमंड हिलेरी और तेनज़िंग का सच
लेकिन अब हम जानते हैं
वो तुम थे मैलरी, तुम

दुनिया में एक तस्वीर इतनी ज़रूरी कभी नहीं हुई
इस एक तस्वीर ने हमें बचा लिया, मैलरी
चोमोलंगमा- दुनिया की देवी माँ
यही कहते थे न तुम भी उसको
उन्तीस हज़ार फीट की ऊँचाई पर
तुम्हारी जीत भरी मुस्कान की ये तस्वीर
इतिहास को फिर से लिखेगी
हम शर्मिंदा हैं तो बस ये सोच कर
तुम्हें इन्साफ देने में हमने देर लगा दी
लेकिन हमें फख्र है इस बात पर
तुमने इंसानी जज़्बे को नई ऊंचाइयाँ दी

हो सके तो हमें माफ़ कर देना, मैलरी

जॉर्ज मैलरी - वो नाम जो पर्वतारोहियों के बीच बेहद इज़्ज़त के साथ लिया जाता है। मैलरी 1924 के एवरेस्ट अभियान के लीडर थे। ये उनका तीसरा और आख़िरी अभियान था। इस बार वो जो गए तो लौट के न आ सके। 75 साल बाद 1999 में उनका शव मिला- 26,760 फ़ीट की ऊंचाई पर ( एवरेस्ट- 29 हज़ार फ़ीट) एडमंड हिलेरी और तेनजिंग ने 1953 में एवरेस्ट पर क़दम रखा था. इस बारे में काफ़ी बहस हो चुकी है कि क्या उस महान पर्वतारोही ने एवरेस्ट की चोटी पर क़दम रखा था लेकिन इस बारे में किसी बहस की गुंजाइश नहीं कि उसमें इस काम को अंजाम देने की क़ाबिलियत थी। तमाम डॉक्यूमेंट्स से इस बात की पुष्टि हुई है कि मैलरी, कामयाबी की सूरत में, अपनी पत्नी ऱूथ का फ़ोटो चोटी पर ऱखना चाहते थे। जब 1999 में उनका शव मिला तो ये फ़ोटो उनके बेहतरीन हालत में मिले शव और कपड़ों के साथ नहीं था। तो क्या.....
सच क्या है, पता नहीं। को़डैक कंपनी ने कहा है कि अगर मैलरी का कैमरा मिलता है तो इस बात की उम्मीद है कि उसकी फ़िल्म को डेवेलप किया जा सके।

ये कविता मुक़्क़मल नहीं है, ये मैं मानता हूं पर इसके मुक़्क़मल होने का इंतज़ार करना चाहता हूं। अगर 75 साल के इंतज़ार के बाद शव मिल सकता है तो थोड़ा और वक़्त गुज़रे, तस्वीर बोलेगी।

Wednesday, July 15, 2009

सत्रहवें फ़्लोर पर...



दो इमारतों के बीच ही सही
सूरज दिखता तो है
सा'ब उसकी लाली को
चाय की प्याली और घरवाली के साथ
अपनी जाली से देखकर
ख़ुश हो लेना

तारों भरा आसमान नहीं दिखेगा
तो आसमान तो नहीं टूट पड़ेगा
आपके पड़ोसी किसी स्टार से कम थोड़े ही हैं

अब लाइफ़स्टाइल की नहीं
स्टाइल की बात कीजिए
किराए का घर कब तक झेलेंगे
यहां, न सही आपके घर का आंगन
नीचे सोसायटी का पार्क तो है
बस आप इस सोसायटी में आ जाइए
फिर देखिए 'सोसायटी' में कितना नाम होगा

आप भी न साहब
'सेक्स एंड द सिटी' सामने है
और आप 'बालिका वधू' पर अटके हैं
थोड़े अप मार्केट बनिए
भाभीजी को नई दोस्त दिलाइए
ख़ुद को भी नई, मेरा मतलब
नए दोस्तों से मिलवाइए

सब छोड़िए
बच्चों के फ़्यूचर के बारे में सोचिए
इंग्लिश स्पीकिंग कोर्स के पम्फ़लेट
इन दरवाज़ों से नहीं सरकते साहब
यहां बच्चों को, वो क्या कहते हैं
हां, माहौल मिलेगा

तो क्या मैं सत्रहवें फ़्लोर पर
टू बीएचके पक्का समझूं ???

Monday, May 25, 2009

प्लेट भर प्यार

मैं अक्सर घर देर से लौटता था
घर में मिलती थीं दो प्लेटें
एक में खाना
दूसरी में संवाद
दोनों एकदम गर्म

मैं अक्सर घर देर से लौटता हूं
घर में मिलती हैं दो प्लेटें
एक में खाना
दूसरी प्लेट से वो हर दोपहर ढका जाता है

Saturday, March 21, 2009

मुझे मशहूर होना है



मैं भी सोचता हूं
लिखूं कोई कविता,गीत
या फिर एक शेर भला सा
जिसमें चांद हो, तारे हों, फूल हों
हो एक तोला 'माही वे' रत्ती भर 'मौला'
और हों कुछ प्यार की बातें
लिखूं वो कि जिसे सुनकर
कोई बरबस बजा दे ताली
करे वाह-वाह
हर तरफ़ मेरी ही जय हो !
कुछ तो ऐसा लिखूं कि
करन जौहर या यश चोपड़ा
कर लें मेरे लिखे गीत
अपनी फ़िल्म में शामिल
और हो जाऊं मैं उनकी तरह...
मशहूर

मैं जला रहा हूं आजकल
अपना लिखा वो सब
जिसे सुन कर कहीं ताली नहीं बजती थी
कहीं नहीं होती थी वाह-वाह
बस...
सन्नाटा सा पसर जाता था
ख़ामोशी
जो टूटने का नाम न लेती थी
शरीर काठ में बदल जाते थे

अब छत पर कटती हैं रातें
देखते हुए चांद को
इस कोशिश में कि
मुझे भी दिख जाए उसमें
परी, नूर या रोटी ही सही
मेरे काम आ रहा है
'मौला'
गुंथ रहा है
कभी मुखड़े तो कभी अंतरे में

...मुझे भी मशहूर होना है

Saturday, October 18, 2008

मैं हूं



मिलना चाहते हो मुझसे
मिलो
मैं हूं
एक ग़रीब लड़की
देखो मुझे
ऐसे क्या देखते हो
घृणा से नहीं थोड़ा प्यार से देखो
मेरे इन मैले कपड़ों को नहीं
इन नंगे पांवों को नहीं

अगर वाक़ई देखना चाहते हो तो
इन आंखों को देखो
इस वक़्त खुश चेहरे को देखो
क्या आंखों में कोई डर देखा
या कि चेहरे पे दर्द की कोई रेखा

नहीं
तुमने ज़रूर देखी होगी
उम्मीद की एक किरण
क्योंकि मैं हूं
एक गीत
बोलो गाओगे मुझे
संभावनाओं का पुलिंदा
अपनाओगे मुझे
फिर?

आओ मिलो मेरे परिवार से
वो खाट पे लेटा शराबी बाप
ये बीमार मां
और मेरे दो भाई तीन बहनें

मुझे नहीं चाहिए
सहानुभूति तुम्हारी
क्योंकि मुझे पता है
मैं हूं
पेट पालने लायक
आठ जनों का
मैं हूं ख़त्म करने के क़ाबिल
सिलसिला ये उलझनों का

बस यही है मेरी कहानी
बोलो
छापोगे कहीं लिखकर
मैं हूं

Wednesday, September 17, 2008

मैं प्रोफ़ेशनल हो गया हूं !


बचपन में जब भी कुछ चुभता था
या कोई किसी बात पर डांटता था
कहां देर लगती थी आंख नम होते

जब कभी टूट जाता था ख़ुद का खिलौना
और भाई का साबुत खिलौना मुंह चिढ़ाता था
कहां देर लगती थी आंख नम होते

गियर वाली साइकिल मांगने पर
जब मिली थी दूसरों-सी साइकिल
कहां देर लगी थी आंख नम होते

याद है उस ग़लती पर डांट खाना
जो मैंने कभी की ही नहीं थी
तब भी कहां देर लगती थी आंख नम होते

जब पहली बार फांदी थी स्कूल की दीवार
और अपने ही दोस्त ने की थी शिकायत
कहां देर लगी थी आंख नम होते

थोड़ा बड़ा हुआ, दोस्तों के साथ फ़िल्में देखने लगा
जब भी परदे पर फूटती थी भावनाएं
कहां देर लगती थी आंख नम होते

जिसको दिलोजान से चाहा था
और दिलोजान ही जब बिखरे
कहां देर लगी थी आंख नम होते

बड़ा होकर पत्रकार बन गया हूं
बम विस्फोट के बाद एक अस्पताल में हूं
हर तरफ़ से आती घायलों की चीख़-पुकार के
मांस का लोथडा बन चुके शरीर के
ज़मीन पर बिखरे सुर्ख़ ख़ून के
'अच्छे शॉट्स' बनवा रहा हूं

ये सब देखता जा रहा हूं
और इंतज़ार कर रहा हूं आंख के नम होने का
लेकिन ये कम्बख़्त तो बड़ी शातिर निकली
आंसू की एक बूंद तक नहीं टपकाई

शायद इसे कहीं से ख़बर लग गई है कि

मैं प्रोफ़ेशनल हो गया हूं

Saturday, January 5, 2008

आवाज़ बुलंद हो



उठाया है हमने जो पहला क़दम
किया है ख़ुद से वादा ली है क़सम
कि कोई चीख़ कोई आह गुम न हो
आंख डरी न हो चेहरा सहमा न हो
ज़ुबां ख़ामोश न हो सवाल थमा न हो
सच आज़ाद हो उन्मुक्त हो ज़िन्दा हो
जंजीरों में छटपटाता झूठ ख़ुद पर शर्मिन्दा हो
क्यूं न हम एक मशाल बनें
अंधेरे को चीरती लौ विशाल बनें
क्यूं न हम लोगों का विश्वास बनें
हर मुश्किल में उनकी आस बनें
इस सबके बीच ख़्याल बस इतना रहे
ये रास्ता आसान नहीं है
पर नामुमकिन भी तो नहीं
तो साथियों हौसला मंद न हो
आवाज़ सदा बुलंद हों


ये कविता तब लिखी गई थी जब पत्रकारिता की दुनिया में क़दम रखा ही था और तस्वीर के सारे पहलुओं से वाक़िफ़ नहीं था। इस बीच नदी में काफ़ी पानी बह चुका है और कई नई चीज़ों से दो चार भी हुआ हूं लेकिन ख़ुशी इस बात की है कि इन पंक्तियों पर भरोसा पहले से मज़बूत ही हुआ है।

Monday, November 12, 2007

मंज़िल



ख़्वाबों की सतरंगी ज़मीन पर
बुना था उसने ताना बाना
बेहद मुश्किल लगभग असंभव
लगा था उसके हाथ
मंज़िलों का एक ख़ज़ाना

अपना साजो-सामां बटोर
वो चल दिया अनजाने छोर
कितने गांव कितने नगर
कितनी पगडंडिया कितनी डगर
तय करता रहा वो अपना सफ़र
इंद्रधनुष के सातो रंग
उसके जीवन के साथी थे
काली स्याह रातों के
दीया और बाती थे

कौन जाने कहां थी मंज़िल
कहां मिले कौन सी मुश्किल
चलते चलते जब थक गया
कुछ पल को रुक गया वो
थोड़ा सुस्ता के फिर चला

भीड़ भरे रास्ते थे
मुश्किलें थीं हर मोड़ पर
लेकिन फ़िक्र उसे मंज़िल की थी
रास्तों से न था गिला

मेहनत उसकी रंग लाई
मंज़िल अपने संग लाई
लेकिन ये क्या
उसकी मंज़िल पर पहले से थे कुछ लोग जमा
जो उस पर करते थे दावा अपना अपना

वो तो मानो टूट गया
और तभी
आँखों से निकली दो बूंदों ने उसे जगाया
मत बहायो ये आँसू वो ख़्वाब था समझाया
बेहद ख़ुश हुआ कि हारा नहीं है वो

लेकिन उसने अब ये जान लिया था
मन ही मन ये ठान लिया था
के उसे पानी ही होगी हर एक मंज़िल
करना होगा हर लक्ष्य हासिल
वो जान गया कि कुछ पल सुस्ताना
मतलब सफ़र में पिछड़ जाना

उसे बेहद अच्छी सीख मिली थी
के मंज़िल पानी हो अगर
तो चलो
बिना थके बिना रुके हर डगर

Thursday, October 25, 2007

ख़बर है !


अचानक कुछ शोर-गुल सुनकर
खिड़की खोल कर झांका बाहर
दृश्य देख चौंका ठिठका
कुछ घर आग के हवाले थे
अंधेरे घरों में उजाले थे
जो अंधेरे से भी काले थे

ये वो वक़्त था
जब आदमी आदमी से दूर था
माने दूरियों का दौर था
उठकर टीवी ऑन किया
कैमरा जो दिखा रहा था
वो देखने लायक नहीं था

पुलिस और प्रशासन
अक्सर मिलकर प्रयोग होने वाले शब्द
और साथ काम करने वाले लोग
पूरी तरह मुस्तैद थे
ऐसी ख़बर थी
शायद सच

दिन किसी तरह गुज़रा

अगले दिन का अख़बार
मेरे ख़याल से ख़ूब बिका होगा
क्यूंकि
मुखपृष्ठ पर थीं दो तस्वीरें
एक ज़िंदा जलाए गए युवक की धुंधली तस्वीर
और गिरफ़्तार लोगों की क्लोज़ अप तस्वीर

तस्वीरों के ऊपर ही ख़बर चस्पा थी
शहर में फिर दंगा भड़का
दो की मौत
शायद बिल्कुल ठीक
मज़हब और इंसानियत की मौत !
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