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Tuesday, November 24, 2009

आतंकवाद तो फ़ायदे का सौदा निकला !

आपने लियोपॉल्ड कैफ़े का नाम तो सुना होगा। अपने देश में त्रासदियां ही जगहों को जोड़ती हैं। जब मुंबई डूबने लगता है तो लोअर परेल, घाटकोपर जैसे इलाक़ों के नाम पूरे देश को पता लग जाते हैं। पश्चिम बंगाल और झारखंड की जगहों को नक्सलवाद ने जनवाया।
हां, तो मैं बात कर रहा था, लियोपॉल्ड़ कैफ़े की...26/11 के हमले का गवाह लियोपॉल्ड कैफ़े। जहां ख़ून के छींटे सबसे पहले पड़े।
लियोपॉल्ड, ख़ून के इन छींटों का सौदा कर रहा है।
वैसे तो अब तक की ज़िंदगी ने बंदे को हर तरह के झटकों के लिए तैयार कर दिया है पर ये झटका दिल पर थोड़ा भारी गुज़रा। दरअसल, जो गोलीबारी यहां हुई थी उसके निशानों को इसकी दीवारों और शीशों पर सुरक्षित रखा गया। यहां तक तो ठीक है। लेकिन अब, कैफ़े ने कॉफ़ी मग और टी-शर्ट बेचना भी शुरु कर दिया है। मग के लिए आपको देने होंगे 300 रुपये, जिस पर 'गोली के उस निशान' की तस्वीर होगी- नाम रखा है- बुलेट प्रूफ़ मुंबई । टी-शर्ट की क़ीमत रखी गई है 400 रुपये। और हां, अब तक 3000 मग बिक भी चुके हैं। एक नया फ़्लोर बन गया है, ग्राहक जो बढ़ गए हैं। यानी, कुल मिलाकर लियोपॉल्ड के लिए हमला फ़ायदे का सौदा रहा।

इस 'कारोबार' से मुझे शायद ज़रा भी तकलीफ़ नहीं हुई होती, अगर मुझे ये पता लगता कि इन कॉफ़ी मग्स या टी-शर्ट्स से होने वाली कमाई को हादसे के शिकार हुए परिवारों को दिया जाएगा।
लेकिन अफ़सोस, ये तो एक शातिर 'बिज़नेसमैन' का बेहतरीन बिज़नेस मूव निकला।

(चित्र सौजन्य: ओपन)
26/11- शहर के सीने में भी दिल धड़कता है

Monday, November 23, 2009

26/11- शहर के सीने में भी दिल धड़कता है


मैं डरा हुआ हूं, सहमा हूं
मैं ख़ामोश हूं, नाराज़ हूं
मैं वो शहर हूं, जिसमें
हाड़-मांस के इंसान रहते हैं

मैं कभी अजमेर हो जाता हूं
कभी जयपुर, कभी दिल्ली
तो कभी मुंबई
मेरे रिसते ज़ख़्मों को ढंकने के
नायाब इंतज़ाम ढूंढ़े हैं सबने
जब मैं दिल्ली होता हूं तो
वो दिल्ली की दिलेरी हो जाती है
जो कभी मुंबई हुआ तो
मुंबई की स्पिरिट

मेरे ज़ख़्म हरे रहते हैं
उनका इलाज नहीं करता कोई
बस, बे-होशी के कुछ इंजेक्शन
दिये जाते हैं हर बार

और मैं फिर तैयार हो जाता हूं
अगला हमला झेलने के लिए

एक बरस हुआ, जब मैं मुंबई था
मैं एक शहर हूं
मेरी ज़िम्मेदारी है
यहां रहने वालों की हिफ़ाज़त
इस एक साल में जो कुछ बदला
उससे मैं मुतमईन नहीं हूं
हां, ग़मज़दा ज़रूर हूं

अपने बाशिंदो से मैं
ये वादा करना चाहता हूं कि
वो अब महफ़ूज़ रहेंगे
क़त्लो-ग़ारत का कोई मंज़र
उन्हें छू तक नहीं सकेगा
उनके बच्चे यतीम नहीं होंगे
किसी मां के आंसू निकलेंगे
तो अपने बच्चे का
पहला क़दम उठता देखने की ख़ुशी से
उसकी आख़िरी चीख़ सुनने के बाद नहीं
किसी बाप को अपने बेटे को कांधा नहीं देना होगा
उस कलाई पर राखी हर साल सजेगी
ये सब कहना चाहता हूं मैं
अपने बच्चों से, अपने बाशिंदों से

पर कहूं कैसे
जानता हूं ये सच नहीं है
उन्हें ख़ुश देखने के लिए मैं झूठ बोल भी दूं
लेकिन फिर सोचता हूं कि
जब सच बेपर्दा होगा
तो उनका
अपने शहर से भरोसा उठ जाएगा

मैं ख़ुद नहीं समझ पा रहा
मेरी चुप्पी मेरी मजबूरी है
या मेरी कमज़ोर याद्दाश्त का नतीजा
ये जो कुछ है
है बहुत डरावनी
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