Saturday, November 6, 2010
इन सर्दियों में नहीं रहा वो
नसों में बहता ख़ून जम रहा था आहिस्ता आहिस्ता
और थरथराते होठों से जब तब आधे अधूरे
कुछ लफ़्ज़ गिरते थे ज़मीं पर
छनाके के साथ टुकडा टुकड़ा हो जाते थे सब
हाथों ने हिलना बंद कर दिया था
हां, आंखों की पुतलियां ज़रुर
दांएं-बांए कभी चक्कर लगा आती थीं
लेकिन इन इशारों का कोई सिरा,
नहीं पकड़ पाया कोई
कि पकड़ पाता तो
ज़िंदगी का हर क़तरा बर्फ न बन पाता
कि पकड़ पाता तो
रगों में बहता ख़ून बहने लायक रहता
इन सर्दियों में नहीं रहा वो
कनॉट प्लेस के इनर सर्किल में
मोंटे कार्लो शोरुम के ठीक बग़ल में
पड़ा है जिस्म, कोई हलचल नहीं है
लगता है ठंड ने चलाई है दरांती रात भर
Tuesday, September 14, 2010
भोपाल लेक पर...उस रोज़
भोपाल लेक में डूबता सूरज
प्यारा लग रहा था उस रोज़
डूबते हुए लाल गोले के
कुछ छींटे तुम्हारे चेहरे पर आ पड़े थे उस रोज़
उस रोज़ तुमने लेक के पानी में
शायद तीन बार उंगलियों से मेरा नाम लिखा था
बोटिंग नहीं की थी हमने उस रोज़
मैने हाथ पकड़ा था तुम्हारा
तुमने घबरा कर हाथ छुड़ाया था उस रोज़
हंस कर कहा था- मैं कहीं भाग थोड़ी रही हूं
मैं भी हंसा था, कहा- ये हाथ ज़िंदगी भर नहीं छोड़ूंगा
वो कॉर्नर वाले रेस्ट्रां की लेक फेसिंग टेबल पर
हमने कॉफ़ी और सेंडविच का ऑर्डर दिया था
वेटर चौंक पड़ा था उस रोज़
जब तुमने बिल पे किया था
उसे क्या पता था कि हमारे दरमियां
फॉर्मेलिटी जैसा कुछ नहीं
बस प्यार है ढेर सारा
उसे शायद आदत नहीं थी ये देखने की
तुम कितना हंसी थीं, उसके चले जाने के बाद
लाल सूरज डूब चुका था अब तक
बस उसकी लालिमा ज़िंदा थी
तुम्हारे चेहरे पर उस रोज़
रेस्ट्रां से निकलते हुए
उस धुंधलके में तुम्हें दिखा था कैंडीफ्लॉस वाला
सड़क के उस पार खड़ा था वो उस रोज़
तुम्हारी पसंदीदा चीज़ों में से एक़
बस..तुम ज़िद्दी बच्चे की तरह
हाथ छुड़ा कर भागी थीं
और
और
ट्रक...टक्कर...ख़ून..शोर
मैं इस ओर सड़क पर ही
गिर पड़ा था
सन्नाटा पसर गया था मेरे कानों में उस रोज़
मैं माफ़ नहीं कर पाउंगा ख़ुद को कभी
मैंने हमेशा हाथ थामे रखने का वादा किया था
क्यूं तुम्हारा हाथ छोड़ दिया फिर
उस रोज़
Wednesday, August 18, 2010
पीपली में 'मौत की रौनक' ज़ाया नहीं गई
अगर आपको पता है आपकी तस्वीर अच्छी नहीं आती और कोई बार बार आके तस्वीर खींचने की ज़िद करे तो बड़ा गुस्सा आता है। बस, इस ग़ुस्से की क़िस्म ज़रा अलग होती है। ऐसा गुस्सा जिसका पता है कि इससे शक्ल बदल नहीं जाएगी। ये फ़िल्म देखते हुए ऐसा अनगिनत बार होता है। एक टीवी पत्रकार के लिए पीपली [लाइव] देखना बुरा सपना है, सज़ा है। अच्छा है, थियेटर में अंधेरा रहता है, वर्ना हमारे प्रफ़ेशन की चीरफाड़ के दृश्यों के दौरान उभरते अट्टाहस में मेरा शामिल न होना, आसपास वालों को अजूबा दिखाई देता, सोचते कैसे बिना सेंस ऑफ़ ह्यूमर के लोग आजकल मल्टीप्लेक्स का रुख़ करने लगे हैं...अच्छा है थियेटर में अंधेरा रहता है, वर्ना ऐसी तस्वीरों के दौरान चेहरा पता नहीं कौन से भावों की तस्वीर पेश कर देता और मैं मुंह छुपाया पाया जाता। फिल्म की अंग्रेज़ी पत्रकार, नंदिता कहती है- If you can't handle it, you are in the wrong profession.फिल्म का राकेश, हो सकता है खुद अनुषा रिज़वी हों, रॉन्ग प्रफेशन में हैं, ऐसे ही किसी लम्हे में एहसास हुआ होगा और छोड़ दिया। ख़ैर, उसे छोड़ जो लपका उसे माशाअल्लाह बेहतरीन तरीक़े से कहने की काबिलियत रखती हैं। राकेश भी उसी रॉन्ग प्रफेशन में था...आज़ाद हो गया, प्रफेशन से...और ज़िंदगी से भी। एक टीवी पत्रकार जब पीपली [लाइव] देख रहा हो, तो उसे ज़्यादा हंसी नहीं आती, आ ही नहीं सकती और स्साला सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि हम शायद चाहकर भी इसकी सटीक, बेबाक समीक्षा नहीं कर पाएंगे। क्यूंकि अगर ऐसा किया तो डर है कहीं लोग प्रिंट आउट लेकर फिर से चिढ़ाने न आ धमकें। या फिर मैं कुछ ज़्यादा ही सोच रहा हूं और सच ये हो कि हम ऐसा करना नहीं चाहते, इसलिए महंगाई डायन और बकलोल करती अम्माजी की आड़ में बाक़ी सारी असलियत डकार गए। सच...क्या है, कौन जाने?
लेकिन शुक्र है , ये फिल्म सिर्फ़ मीडिया के बारे में नहीं है। हमने व्यंग्य की ताक़त को हमेशा अनदेखा किया। किताबों में भी और सिनेमा में भी। लेकिन जो बात व्यंग्य अपनी पैनी धार और चुटीले अंदाज़ में कह जाता है, उसकी बराबरी शायद सीधी कहानी कभी न कर पाए। अनुषा ने व्यंग्य की धार से बहुत सारे जाले काटे हैं। ये धार कहीं कहीं इतनी पैनी है कि दिल रोने रोने जैसा होता है। होरी महतो रोज़ाना एक 'ख़ज़ाना' खोदता है, दो जून की रोटी के वास्ते। आज़ादी के 63 साल बाद और इस कृषि प्रधान देश में जन्म लेने के 75 साल (गोदान-1936) बाद भी होरी महतो आज तमाम गांवों में मिट्टी खोद रहा है या यूं कहिए अपनी क़ब्र खुद खोद के वहीं दफ़्न हो रहा है। एक, दूसरा किसान खुदकुशी से लाख रुपये कमाना चाहता है। एक एग्रीकल्चर सेक्रेटरी, नये नवेले आइएएस अफ़सर को 'फ़ाइन दार्जिंलिंग टी' के सहारे आंखें मूंदने की घुट्टी पिला रहा है। एक डीएम, नत्था 'बहादुर' को लाल बहादुर दिला रहा है। पीपली के चुनावों में नत्था की खुदकुशी के ऐलान ने सारे समीकरणों को तोड़-मरोड़ दिया है और अद्भुत तरीक़े से बुने और फिल्माए गए सीन में एक बड़ा भाई छोटे को ख़ुदकुशी के लिए राज़ी कर रहा है। 14-15 बरस के अल्हड़ लड़के (पढ़ें-मीडिया) को ये सब बेहतरीन तमाशा नज़र आता है सो वो चीख़-चीख़कर इस स्टोरी के सारे पहलुओं पर अपनी चौकस नज़र जमाता है शायद ये सोचकर भी कि 'मौत की रौनक' ज़ाया नहीं होनी चाहिए। मौत की रौनक---प्रिंस, कुंजीलाल, सूरज और भी कुछ छितरे हुए नाम इस डायलॉग के बाद दिमाग़ में कौंध जाते हैं। ये तमाम ताम-झाम, ये मेला अगर नाकाबिल हाथों में रहा होता तो ऐसा बिखरता कि आप माथा ठोंकते पर गनीमत है कि अनुषा की मीडिया बैकग्राउंड ने फ़िल्म को साधारण से असाधारण के स्तर तक उठा दिया है।
फिल्म कई मायनों में तय समीकरण तोड़ती है। एक ऐसे सिनेमाई माहौल में जहां रिश्तों और पीआर से कास्टिंग तय होती हो, वहां अनुषा और महमूद ने किरदार चुने और बुने हैं। फिल्म का गांव कोई सेट नहीं है, बल्कि अपनी पूरी धूप-छांव, खेत खलिहान, गली, नुक्कड़, चबूतरे के साथ मौजूद गांव है। फिल्म बिना शक़ हमारे वक़्त के सबसे अहम दस्तावेज़ों में से है।
और हां, सैफ़ अली ख़ान का सालों पुराना चुंबन अगर कहीं ज़िंदा है विद 2 बाइट्स तो यक़ीन मानिए, आज हमारे वक़्त की सबसे बड़ी स्टोरी होगी। अं, अं, क्या हम किसान आत्महत्या पर बनी किसी फ़िल्म की चर्चा कर रहे थे???
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