Saturday, August 1, 2015

ये एनजीओ बहुत हसीन है !

ये तेरा एनजीओ...ये मेरा एनजीओ...ये एनजीओ बहुत हसीन है। 
वाकई कुछ तो हसीन होता ही होगा न....तभी तो देखते देखते देश में 31 लाख एनजीओ बन गए। 
अभी तो कर्नाटक, ओडिशा और तेलंगाना का आंकड़ा जुड़ना बाक़ी है...यानी संख्या इससे भी ऊपर जाएगी। 

इतने तो स्कूल भी नहीं, सरकारी अस्पताल से 250 गुना ज़्यादा ठहरती है ये संख्या। पुलिस वाला भले 700 लोगों पर एक हो, लेकिन एनजीओ ज़रूर 400 हिंदुस्तानियों पर एक है। अकेले दिल्ली में 76 हज़ार एक एनजीओ हैं...76 हज़ार तो ख़ालिस एनजीओ और एक अभी भी ख़ुद को एनजीओ समझने वाली सरकार
यानी, हर 225 दिल्ली वालों पर एक एनजीओ। 

देश में ग़रीबी की तस्वीर भले बदरंग हो, रोज़गार के मौके सीमित हों, स्वच्छ भारत का सपना कचरा-पेटी में छटपटा रहा हो, बाल मज़दूरी ख़त्म होने से कोसों दूर हो, महिला अधिकार एक नारा हो, तालीम के हक़ पर कई मोटे ताले हों...लेकिन एनजीओ वो धंधा साबित हो रहा है जो क़िस्म-क़िस्म के फ़ायदे उठाने के लिए एकदम मुफ़ीद लगता है!

यही वजह है कि बीते कुछ सालों में एनजीओ कुकुरमुत्ते की तरह हर गली, हर मोहल्ले में नुमाया होने लगे हैं। 
एनजीओ तो लगातार बढ़ रहे हैं लेकिन देश की मुश्किलें कम नहीं हो रहीं। यानी एनजीओ के काम और देश की समस्याओं में कोई सीधा रिश्ता नज़र नहीं आता। 
तो आख़िर कर क्या रहे हैं एनजीओ?
दरअसल, ये एक ऐसा धंधा बनता जा रहा है जो बिना हर्र और फिटकरी के ही चोखा साबित हो रहा है। 
एनजीओ के नाम पर हर तरह का गोरखधंधा चल रहा है। ये संस्थाएं होती ज़रूर ग़ैर सरकारी हैं लेकिन सरकारी योजनाओं के सहारे भी धन की बेल खूब फलती-फूलती रहती है। 
केंद्र सरकार ने 140 एनजीओ को कई बार चेतावनी दी कि अपने चंदे की जानकारी सरकार को मुहैया कराये लेकिन इन सभी चेतावनियों को इन एनजीओ ने नज़रअंदाज कर दिया। सरकार इन एनजीओ के एजेंडे की जांच के लिए काफी सख्त नजर आ रही है। फोर्ड और ग्रीनपीस जैसे बेहद बड़े एनजीओ अलग तरह से जांच के घेरे में हैं। 
हालांकि, इस घटाटोप तम के बीच उम्मीद की कुछ उजली किरणें भी हैं। हाल ही में गूंज एनजीओ के अंशु गुप्ता को मैगसेसे पुरस्कार इसका सबूत है। कई और एनजीओ भी हैं जो लगातार देश और समाज की भलाई के लिए निस्वार्थ भाव से सेवा में जुटे हैं। लेकिन इनकी संख्या इतनी कम है कि बड़ी तस्वीर मैली कुचैली ही दिखाई देती है। 

Tuesday, August 27, 2013

रॉबर्ट वाड्रा छोटे किसान हैं तो :

हरियाणा के मुख्यमंत्री कहते हैं- रॉबर्ट वाड्रा छोटे किसान हैं। अगर ऐसा है तो :

1. मंगल ग्रह दरअसल वो गेंद है जो धोनी के छक्के से वहां पहुंची है।

2. मनमोहन सिंह एक अर्थशास्त्री हैं जिसने IIPM से एमबीए किया है।


3. सोनिया गांधी और राजीव गांधी की मुलाक़ात एवरेस्ट पर झंडा फहराने के दौरान हुई थी।

4. राहुल गांधी दूरदर्शी, समझदार और विवेकशील नेता हैं।

5. मोदी एक विनम्र और सहिष्णु मुख्यमंत्री हैं।

6. साल के अंत तक एक रुपये में पांच डॉलर आयेंगे।

7. फूड बिल का मतलब है कि अब बाहर कुछ भी खाने पर बिल लेना अनिवार्य होगा।

8. दाऊद इब्राहिम एक समाजसेवी है जिसने ओसामा बिन लादेन फाउंडेशन की स्कॉलरशिप पर सीरिया स्थित हार्वड से पढ़ाई की है।

9. ओबामा आईएसआई का एजेंट है जिसका अगला निशाना एंपायर एस्टेट बिल्डिंग है।

इसमें बढ़ोतरी करने के लिए आपका स्वागत है..

Saturday, August 24, 2013

...दिसंबर की उन सर्दियों में


उन तख़्तियों में, उन बैनरों में
उन चीख़ों में, उन आवाज़ों में
उन भिंची हुई मुट्ठियों
और जलती हुई आंखों में
लहू के क़तरे थे, उबाल थे
जज़्ब हुई कई टीसों के सवाल थे
तंत्र बदलना होगा, जब कहा था हमने
...दिसंबर की उन सर्दियों में

ढेर सारे वादे किए, क़समें लीं
खुद ब खुद एक लहर चली थी
नींद से जाग उठा था एक पूरा मुल्क
...दिसंबर की उन सर्दियों में

लेकिन तुम चली गईं
दर्असल, उस दिन तुम नहीं गई थीं
तुम जिंदा थीं उन हौसलों में
जिनको लंबी लड़ाई लड़नी थी
तुम ज़िंदा थीं उन फ़ैसलों में
जो क़ानून की शक्ल में नुमाया हुए
तुम कहीं भी नहीं गई थीं
...दिंसबर की उन सर्दियों में

कुछ बातें हुईं ठोस क़दम उठाने की
आधे हिंदुस्तान को महफ़ूज़ रखने के लिए
क़ानून के नाख़ून थोड़े और पैने किए गए
आहिस्ता-आहिस्ता आठ महीने बीत गए
लेकिन एक बार फिर पांच दरिंदों ने
एक और शहर पर दाग़ लगा दिया
जो मोमबत्तियां इंडिया गेट पर रोशन हुई थीं
वो अब गेटवे ऑफ़ इंडिया पर होंगी
कुछ भी तो नहीं बदला
वो सख़्त क़ानून और उसका ख़ौफ़ कहां था
क्या हुआ उन वादों का, जो किए थे हमने
...दिसंबर की उन सर्दियों में

हो सके तो हमें माफ़ कर देना
आधी आबादी को एक महफ़ूज़ मुल्क देना
बड़ा मुश्किल काम मालूम होता है
देश की हर मां से जो रूहानी रिश्ता जोड़ा था तुमने
माफ़ करना, उसकी लाज नहीं रख सके
हमारी नज़रें नीची हैं
कि शर्म के परदे में कमज़ोरी छिपती सी लगती है
इज़्ज़त और इंसानियत से भरी वादों की वो गठरी
लगता है वहीं छूट गई...इंडिया गेट पर
...दिसंबर की उन सर्दियों में