Tuesday, December 1, 2009

एक किताब और एक फ़िल्म के बहाने इंसानी जज़्बात के हज़ार रंग


इंसानी जज़्बात तमाम चीज़ों से बेतरह प्रभावित होते रहते हैं। किताब के पन्ने और सिनेमा के पर्दे पर न जाने कितने एहसास, कितनी बार ख़ूब बारीकी से छिटकाए गए हैं।
लेकिन आज मैं आपसे उस किताब और फ़िल्म का ज़िक्र कर रहा हूं जिसने इन जज़्बातों को कुछ इस क़दर छुआ है कि वो भुलाए नहीं भूलते।
पहले किताब का ज़िक्र कर लेते हैं। किताब का नाम है- वाइज़ एण्ड अदरवाइज़ (Wise and Otherwise)। सुधा मूर्ति ने लिखा है इसे...नहीं, लिखा कहना ठीक नहीं होगा, ये किताब लिखी नहीं बुनी गई है हमारी इंसानियत और शैतानियत के तमाम धागों से। सुधा मूर्ति कई सालों से इंफ़ोसिस फ़ाउंडेशन चला रही हैं। इस दौरान हर तरह के लोगों से उनकी मुलाक़ात होती रहती है। निहायत ईमानदार,अच्छे लोग और बेहद ओछे भी यानी इंसानी जज़्बात का हर रंग क़रीब से देखने का मौक़ा मिला है उन्हें। और जब एक ऐसा व्यक्ति ये सब महसूस कर रहा हो जिसके अंदर एक लेखक भी रहता हो तो ज़ाहिर है वो दुनिया को इसे बताना भी चाहेगा। यही किया है सुधा मूर्ति ने इस किताब के ज़रिए। 51 ऐसे तजुर्बे जिन्हें पढ़ने के दौरान आप एक आत्म-परीक्षण के मोड में चले जाते हैं कि मैं इन सारे लोगों के बीच कहां खड़ा हूं। ये किताब आजकल नित नई आती तमाम 'मोटिवेशनल' किताबों पर भारी है क्यूंकि इसके अनुभव इसी ज़मीन से आम इंसानों से लिए गए हैं।
अब करते हैं फ़िल्म की बात। आसिफ़ कपाड़िया ब्रिटेन में बसे फ़िल्ममेकर हैं। वही जिन्होंने कई साल पहले 'वॉरियर' बनाई थी, इरफ़ान ख़ान को लेकर। जिस फ़िल्म का मैं ज़िक्र कर रहा हूं, वो बेहद ख़ूबसूरत, टुंड्रा इलाके में फ़िल्माई गई 'फ़ार नॉर्थ'
(Far North) है। माफ़ कीजिएगा, जिस तरह मैंने किताब का ज़िक्र किया, उस तरह इस फ़िल्म का नहीं कर पाऊंगा क्यूंकि जिस जज़्बात को ये फ़िल्म उभारती है, उसका ज़रा भी ज़िक्र करते ही फ़िल्म का मज़ा ख़राब हो जाएगा और हो सकता उसे देखते हुए आप समझ जाएं कि आगे क्या होगा।
हां, मैं इतना ज़रूर कह सकता हूं कि अगर आप इसे रात को देखेंगे तो नींद आने में थोड़ी तकलीफ़ ज़रूर होगी। ये फ़िल्म आपको झकझोर देती है क्यूंकि जो दिखाया गया है वो आप कभी सपने में भी नहीं सोच सकते थे।
हालांकि, मेरा मानना है कि हालात हमारे एहसासों को किस तरह बदलेंगे, आप कभी गारंटी नहीं ले सकते।

Tuesday, November 24, 2009

आतंकवाद तो फ़ायदे का सौदा निकला !

आपने लियोपॉल्ड कैफ़े का नाम तो सुना होगा। अपने देश में त्रासदियां ही जगहों को जोड़ती हैं। जब मुंबई डूबने लगता है तो लोअर परेल, घाटकोपर जैसे इलाक़ों के नाम पूरे देश को पता लग जाते हैं। पश्चिम बंगाल और झारखंड की जगहों को नक्सलवाद ने जनवाया।
हां, तो मैं बात कर रहा था, लियोपॉल्ड़ कैफ़े की...26/11 के हमले का गवाह लियोपॉल्ड कैफ़े। जहां ख़ून के छींटे सबसे पहले पड़े।
लियोपॉल्ड, ख़ून के इन छींटों का सौदा कर रहा है।
वैसे तो अब तक की ज़िंदगी ने बंदे को हर तरह के झटकों के लिए तैयार कर दिया है पर ये झटका दिल पर थोड़ा भारी गुज़रा। दरअसल, जो गोलीबारी यहां हुई थी उसके निशानों को इसकी दीवारों और शीशों पर सुरक्षित रखा गया। यहां तक तो ठीक है। लेकिन अब, कैफ़े ने कॉफ़ी मग और टी-शर्ट बेचना भी शुरु कर दिया है। मग के लिए आपको देने होंगे 300 रुपये, जिस पर 'गोली के उस निशान' की तस्वीर होगी- नाम रखा है- बुलेट प्रूफ़ मुंबई । टी-शर्ट की क़ीमत रखी गई है 400 रुपये। और हां, अब तक 3000 मग बिक भी चुके हैं। एक नया फ़्लोर बन गया है, ग्राहक जो बढ़ गए हैं। यानी, कुल मिलाकर लियोपॉल्ड के लिए हमला फ़ायदे का सौदा रहा।

इस 'कारोबार' से मुझे शायद ज़रा भी तकलीफ़ नहीं हुई होती, अगर मुझे ये पता लगता कि इन कॉफ़ी मग्स या टी-शर्ट्स से होने वाली कमाई को हादसे के शिकार हुए परिवारों को दिया जाएगा।
लेकिन अफ़सोस, ये तो एक शातिर 'बिज़नेसमैन' का बेहतरीन बिज़नेस मूव निकला।

(चित्र सौजन्य: ओपन)
26/11- शहर के सीने में भी दिल धड़कता है

Monday, November 23, 2009

26/11- शहर के सीने में भी दिल धड़कता है


मैं डरा हुआ हूं, सहमा हूं
मैं ख़ामोश हूं, नाराज़ हूं
मैं वो शहर हूं, जिसमें
हाड़-मांस के इंसान रहते हैं

मैं कभी अजमेर हो जाता हूं
कभी जयपुर, कभी दिल्ली
तो कभी मुंबई
मेरे रिसते ज़ख़्मों को ढंकने के
नायाब इंतज़ाम ढूंढ़े हैं सबने
जब मैं दिल्ली होता हूं तो
वो दिल्ली की दिलेरी हो जाती है
जो कभी मुंबई हुआ तो
मुंबई की स्पिरिट

मेरे ज़ख़्म हरे रहते हैं
उनका इलाज नहीं करता कोई
बस, बे-होशी के कुछ इंजेक्शन
दिये जाते हैं हर बार

और मैं फिर तैयार हो जाता हूं
अगला हमला झेलने के लिए

एक बरस हुआ, जब मैं मुंबई था
मैं एक शहर हूं
मेरी ज़िम्मेदारी है
यहां रहने वालों की हिफ़ाज़त
इस एक साल में जो कुछ बदला
उससे मैं मुतमईन नहीं हूं
हां, ग़मज़दा ज़रूर हूं

अपने बाशिंदो से मैं
ये वादा करना चाहता हूं कि
वो अब महफ़ूज़ रहेंगे
क़त्लो-ग़ारत का कोई मंज़र
उन्हें छू तक नहीं सकेगा
उनके बच्चे यतीम नहीं होंगे
किसी मां के आंसू निकलेंगे
तो अपने बच्चे का
पहला क़दम उठता देखने की ख़ुशी से
उसकी आख़िरी चीख़ सुनने के बाद नहीं
किसी बाप को अपने बेटे को कांधा नहीं देना होगा
उस कलाई पर राखी हर साल सजेगी
ये सब कहना चाहता हूं मैं
अपने बच्चों से, अपने बाशिंदों से

पर कहूं कैसे
जानता हूं ये सच नहीं है
उन्हें ख़ुश देखने के लिए मैं झूठ बोल भी दूं
लेकिन फिर सोचता हूं कि
जब सच बेपर्दा होगा
तो उनका
अपने शहर से भरोसा उठ जाएगा

मैं ख़ुद नहीं समझ पा रहा
मेरी चुप्पी मेरी मजबूरी है
या मेरी कमज़ोर याद्दाश्त का नतीजा
ये जो कुछ है
है बहुत डरावनी

Friday, November 13, 2009

ई साला, मधु कोड़ा को दोषी कौन बताया !


मधु कोड़ा पर जब हर किसी के हाथ कोड़े बरसाने को मचल रहे हैं, ऐसे में हमें उन पर तरस आता है।
बेचारे का कसूर ही क्या है। जानना चाहते हैं, उनकी ग़लती क्या है। उनको अपने नाम की लाज बचाने की सज़ा मिल रही है।
मधु कोड़ा- मधु समझते हैं ना। अब तमाम मक्खियां शहद के पास खिंची आ रही हैं तो इसमें शहद का काहे का दोष। बल्कि वो तो आपको बराबर आगाह करत रहे कि- मूरख जनता, मैं ज़ुबान पर मधु लगता रहूंगा लेकिन पीठ पर जमकर कोड़े बरसाऊंगा। आख़िर अपने नाम का कोई इज़्ज़त है कि नहीं।

बताया जा रहा है कि मधु कोड़ा का बॉलीवुड कनेक्शन भी रहा। अब भइया सुन लिये होंगे कहीं से कि बॉलीवुड में ख़ानों का सिक्का चलता है। सो आव देखे न ताव, झारखंड की तमाम खानों पर क़ब्ज़ा जमा लिये। जल्दबाज़ी बहुतई थी। बेचारे देखना ही भूल गए कि बॉलीवुड वाले ख़ान में तो नुक़्ता लगा हुआ है। अब उनकी नुक़्ताचीनी की कोई आदत रही हो ध्यान दें। । वो रहे निहायत सीधे सादे आदमी। पिताजी किसानी करते रहे, वो घर में बोरियों में नोटों को आलू समझ कर भरते रहे।

4 हज़ार करोड़ रुपये डकार गए यानी 1 दिन में करीब 3 करोड़ 60 लाख। इतना डकारना था तो दो-चार सौ का हाजमोला का भी बजट रख लिये होते - पेट दर्द तो नहीं होता। पड़े रहे कुछ दिन अपोलो रांची में पेट दर्द में जकड़े। इतना पचाना आसान थोड़े ही है।
मज़े की तो जे रही कि जब तक कांग्रेस के छत्ते से टपक रहे थे, सब ठीकही था, जैसे ही अचानक कोई भालू आकर इस छत्ते की ऐसी तैसी कर गया तबही से 'बिना परों की मक्खी, न इस छत्ते की न उस छत्ते की' जैसी हालत हुई रही।

(चित्र सौजन्य: द हिंदू)

Monday, November 9, 2009

हिंदी के लिए ऐतिहासिक दिन- ख़बरिया चैनलों ने दिया 'राष्ट्रभाषा' का दर्जा !


अबु आज़मी ने महाराष्ट्र विधानसभा में हिंदी में शपथ क्या लेनी चाही, हंगामा मच गया। राज के गुंडों ने अपना घटियापन दिखाते हुए उनका माइक फेंका, थप्पड़ मारा। यानी टीवी के विजुअल का पूरा मसाला मौजूद था। सो दोपहर होते-होते ख़बरिया चैनल इन विजुअल्स पर 'गोलों' और 'तीरों' की बौछार से जगमग हो गए। अब चूंकि मैं बेचारा हिंदी भाषी हूं तो हिंदी चैनल ही देख रहा था। कुछ ही देर में चैनलों के एंकर्स को जोश चढ़ा और एमएनस के प्रवक्ता शिरीष पार्कर और एमएनएस के दूसरे लोगों से सवाल दागना शुरु कर दिया कि भई, हिंदी तो 'राष्ट्रभाषा' है, जिसका दर्जा राज्यभाषा(मराठी) से बड़ा है तो इसमें इतना बवाल काहे के लिए। लगा कि शायद मैंने कुछ ग़लत सुना है। लेकिन शाम पांच बजे के बुलेटिन्स में भी कमोबेश वही सुर कि आख़िर राज ठाकरे 'राष्ट्रभाषा' का सम्मान क्यूं नहीं कर रहे।
यानी शाम होते-होते ये तो पक्का हो गया कि मुझे अपने कान चैक कराने की कोई ज़रूरत नहीं। एंकर्स हिंदी को 'राष्ट्रभाषा' ही मान रहे हैं। लगा, शायद प्राइम टाइम में चैनल के आला अधिकारी ये ग़लती सुधार लेंगे और एंकर्स को बता देंगे कि भाईयों और महिला एंकरों(चैनलों में महिला एंकरों को बहन कहने का रिवाज नहीं है!)- हिंदी, देश की 'राष्ट्रभाषा' नहीं बल्कि 'राजभाषा' है यानी वो भाषा जिसमें केन्द्र का सरकारी कामकाज किया जाए।

लेकिन, मैं कितना ग़लत था। प्राइम टाइम में हिंदी के ख़बरिया चैनलों का अपनी 'राजभाषा' के लिए प्यार हिलोरें लेने लगा था। और फिर प्यार में सब जायज़ होता है न। सो, क्रोमा सेट भी तैयार हो गए कि - राष्ट्रभाषा पर 'राज' नीति'। एक बड़े ख़बरिया चैनल के मुखिया से जब इस पर आपत्ति जताई गई कि ये ग़लत है। संविधान ने ही तय किया था कि इस देश में इतनी भाषाएं बोली जाती है और सभी प्रमुख भाषाएं परिपक्व हैं। ऐसे में किसी एक भाषा को 'राष्ट्रभाषा' नहीं बनाया जा सकता, तो उनका जवाब था कि अरे, हिंदी प्रदेशों के लोग तो इसे 'राष्ट्रभाषा' ही मानते हैं न। यानी चैनल का जो स्टेंड है, वो सही है। लेकिन ये तर्क समझ से परे है। इस तर्क पर चलें तो फिर राज ठाकरे से ज़्यादा सही तो कोई नहीं है जो मराठी प्रदेश का होकर उसे ही 'राष्ट्रभाषा' मान रहा है।

दरअसल, जो कुछ महाराष्ट्र विधानसभा में हुआ, वो शर्मनाक़ है। संविधान आपको छूट देता है, किसी भी भाषा में शपथ लेने की और जो गुंडागर्दी राज के गुर्गों ने की उसके लिए उन्हें कड़ी सज़ा भी मिलनी चाहिए। मेरा सवाल सिर्फ़ इतना है कि इस मुद्दे के बाद हमारे हिंदी ख़बरिया चैनलों का रवैया अजीब तरीक़े से इकतरफ़ा रहा है, जिसमें उनकी निष्पक्षता नहीं बल्कि हिंदी को लेकर बावलापन ज़्यादा नज़र आ रहा था। जो कहीं-कहीं उसे देश की दूसरी भाषाओं से श्रेष्ठ ठहराने की कोशिश तक जाने को तैयार था। ये अति उत्साह ही हिंदी को 'राजभाषा' से 'राष्ट्रभाषा' बना गया। इस अति उत्साह का एक नुकसान ये भी हुआ कि एमएनएस की इस घिनौनी हरकत पर जो दूसरे अहम सवाल उठने चाहिए थे, वो सब दब गए।

मैं हिंदी में ब्लॉगिंग करता हूं और मुझे ये भाषा बोलने पर फ़ख्र है, लेकिन क्या मुझे इससे ये हक़ मिल जाता है कि मैं कहूं कि नहीं, ब्लॉगिंग सिर्फ़ हिंदी में होनी चाहिए क्यूंकि यही श्रेष्ठ है, बाक़ी सब कूड़ा है। अगर नहीं, तो हिंदी ख़बरिया चैनलों को भी कोई हक़ नहीं कि हिंदी को लेकर बावलापन दिखाया जाए।

सबसे मज़े की बात ये कि हिंदी को 'राजभाषा' की जगह 'राष्ट्रभाषा' बताकर इन चैनलों ने हिंदी भाषा के बारे में जानकारी का अभाव ही दिखाया है।
वैसे सुबह अख़बार क्या लिखते हैं, देखना दिलचस्प होगा।

Wednesday, October 7, 2009

करवाचौथ पर एक विवाहिता का ख़त यश चोपड़ा के नाम

ये एक ख़त आपसे शेयर कर रहा हूं। शायद पोस्ट नहीं किया गया, आज रास्ते में पड़ा मिल गया था :-)

डियर यश चोपड़ा जी
आप तो जानते ही होंगे कि आज करवा चौथ है। मैं भी कितनी पागल हूं, आपसे से ये सवाल कर रही हूं। वो क्या है कि पहली बार इत्ते बड़े आदमी को चिट्ठी लिख रही हूं न इसलिए, इससे पहले सिर्फ़ अपने प्रेमी को लिखने का तजुर्बा है। अब आपसे क्या छुपाना। आप नहीं जानते कि आपने डीडीएलजे बनाकर देश पर कितना उपकार किया है। हम विवाहिताओं के लिए यही तो एक दिन होता है जब हमें भी लगता है हमारा पति एकाकार होकर शाहरुख़, सलमान या अमिताभ बन गया है। वर्ना रोज़ तो वही किसी एक्स्ट्रा की तरह कोने में पड़ा रहता है। इस दिन लाखों मेंहदी वालों की दुआएं भी आपको लगेंगी क्यूंकि अगर यश राज फ़िल्म्स न होता तो समझिए, इस 'पावन' दिन हज़ारों-लाखों लोग बेरोज़गार ही रहते। हर सड़क, गली, नुक्कड़, कूचे में यूं छोटा सा स्टूल, उसके दोनों तरफ़ निकला भीमकाय शरीर और साथ खड़ा 45 किलो का जीव कहां नज़र आ पाता। वो पार्लर, वो डिज़ायनर चोली-छलनी (बिना साम्य के बावजूद दोनों को एक साथ समेटने के लिए माफ़ी), वो सजना-संवरना, वो इतने सारे ताम-झाम के बदले में 'हीरा है सदा के लिए' की आस...बस ये समझ लीजिए कि मंदी के इस दौर में आप बाज़ार को अनजाने में ही नई दिशा दे रहे हैं। आभार।

वो तो आपका शुक्रिया करने से रहे। चलिए, हमारे ख़बरिया चैनलों की तरफ़ से मैं ही आपको शुक्रिया अदा कर देती हूं। अब आप उनको इतना माल-मसाला जो देते हैं। इस 'पुनीत' अवसर पर बनने वाले कार्यक्रमों में बैकग्राउंड में आप ही की फ़िल्मों का संगीत गूंजा करता है। ऐश्वर्या सरीखियों का करवाचौथ 'कैप्चर' करने के लिए 'जलसा' के सामने वाले फ़्लैट तक किराए पर लिए जाते हैं। हम जैसी विवाहिताएं भी टीवी के सामने बैठकर 'एक्सपर्ट्स' से समझती हैं कि आख़िर कौन से साम-दाम-दंड-भेद से पति को इसी भांति काबू में रखा जा सकता है। तब जाकर इन चैनलों के प्रोड्यूसर टाइप लोग भी गर्व से टीआरपी का तिलक लगा के अपनी-अपनी वालियों के सामने जाके खड़े हो पाते हैं। इसलिए,इनकी तरफ़ से आपका शुक्रिया, करवाचौथ को घर-घर पहुंचाने के लिए, ये आप ही के काम को आगे बढ़ा रहे हैं।

और तो और पर्यावरणविद् तक आपको थैंक्स कह रहे होंगे। जब करोड़ों महिलाए निर्जला व्रत रखेंगी तो करोड़ों लीटर पानी की बचत भी तो होगी। बल्कि वो तो कह रहे हैं कि करवाचौथ जैसे 'एनवायरनमेंट फ़्रैंडली' दिन को महीने में एक बार अनिवार्य कर देना चाहिए।

अच्छा अब लिखना बंद करती हूं। काफ़ी तैयारी करनी है। रात को शाहरुख़... नहीं..मेरा मतलब मेरा वाला, पानी के साथ कुछ चमकने वाली चीज़ भी लाने वाला है।
हां, मेरी तरफ़ से भंसालीजी और रवि चोपड़ाजी को भी तहेदिल से शुक्रिया अदा कीजिएगा। उनका योगदान भी कम नहीं रहा है, इस 'महापर्व' का मेक-अप करने में।

मैं उम्मीद करती हूं कि अगले साल चांद नज़र न आए तो उसकी जगह आपकी और आदित्य जी को तस्वीरों की ही अर्घ्य चढ़ा लिया जाए।

आपकी (अपने पति की भी) एहसानमंद
एक पूर्ण स्वदेशी विवाहिता

Friday, October 2, 2009

हमारी पीढ़ी के लिए शहर 'किरदार' क्यूं नहीं बन पाते ?


मैं जब भी घर-परिवार या बाहर किसी बड़े से उनके शहर के बारे में यादों की चाशनी में पगी बातें सुनता था तो बड़ा अजीब लगता था। ये सोच कर नहीं कि देखो, इन लोगों को बैठे ठाले कुछ काम तो है नहीं बस गपोड़ बने रहते हैं। अजीब दरअस्ल ये सोच कर लगता था कि हमें अपने शहरों से इतना जुड़ाव क्यूं नहीं है। उनके लिए अगर शहर उनकी ज़िंदगी का एक हिस्सा रहे, एक 'किरदार' रहे तो हमारे लिए सिर्फ़ एक नाम क्यूं। आगे बढ़ने से पहले साफ़ कर दूं कि मैं बात कर रहा हूं आज के 22-28 साला नौजवानों की, जिनमें मैं भी शामिल हूं और इसलिए इस अजीब कश्मकश को शिद्दत से महसूस करता हूं। इस पर थोड़ा सोचने के बाद कुछ दिलचस्प बातें सामने आईं हैं। मुमकिन है इन्हीं बातों में 'अपने शहरों' से हमारी दूरियों का फ़लसफ़ा छुपा हो।

शहर ज़िन्दा होते हैं अपने अड्डों से। अड्डे, जिनसे यादें जुड़ी होती हैं, वहां जमने वालों की। अड्डे जो मिलकर शहर को उसकी शक्ल मुहैया कराते हैं, जो उसे एक ऐसे किरदार में बदल देते हैं जिससे दूरियां बहुत तड़पाती हैं। आपने कभी यार-दोस्तों के साथ खाते-पीते इस तरह के जुमले ख़ूब सुने होंगे- 'यार, चाय तो फलां जगह की होती थी, ये भी कोई चाय है' या फिर 'फलाने हलवाई की जलेबियों में गज़ब का स्वाद होता था' या 'कभी शहर जाना होता है तो दोस्तों की टोली यूनिवर्सिटी के पीछे वाले रेस्त्रां में ही मिलती है' या फिर 'याद है, मुहब्बत करने वाले अक्सर उसी पेड़ की छांव में ठंडक ढूंढ़ते थे। '
किसी शहर से लगाव पैदा करने में इस तरह की यादें बहुत अहम हो जाती हैं। अगर इस तरह की यादें नहीं हैं तो यकीन मानिए आपके लिए वो शहर सिर्फ़ एक नाम ही रहेगा या ज़्यादा से ज़्यादा वो जगह जहां आपकी शुरुआती शिक्षा हुई। अगर हमारे बुज़ुर्गों के पास ऐसी यादों की पूरी पोटली है तो हमसे एक पीढ़ी पहले के लोगों के पास मुट्ठी भर यादें तो हैं ही।

लेकिन हमारे पास क्या है?

ऐसा नहीं है कि हमारी पीढ़ी में अड्डेबाज़ी नहीं होती, ठीक-ठाक होती है। बस, अड्डे ऐसे हो गए हैं जो हर शहर में कमोबेश एक से हैं- एक दूसरे की फ़ोटोकॉपी। अब आप बरिस्ता, कैफ़े कॉफ़ी डे, मैकडोनाल्ड्स या पिज़्ज़ा हट जैसे नामों से तो अपने शहर को याद नहीं करेंगे न क्यूंकि जब आप अपने शहर को छोड़ आए हैं तो भी नए शहर में आपको ये सब मिलेंगे तो फिर वो ख़ास तो कहीं छूटा ही नहीं जो शहर को उस शिद्दत से याद दिलाए या कहिए कि दिल में दर्द पैदा कर दे कि वो भी क्या शहर था, वो भी क्या दिन थे। यानी हुआ ये कि आपके ट्रांसफ़र होते ही ये सारे अड्डे अपने पूरे रंग-ढंग के साथ ट्रांसफ़र हो गए। और फिर फ़ेसबुक, ऑरकुट और ट्विटर जैसे वर्चुअल अड्डे तो आपको शहर से लगाव पैदा करवाने से रहे।

तो बात यहां पर आकर ख़त्म हुई ठहरी कि जो हुआ सो हुआ, अगर अब अपने शहर जाना हो, तो उसे बिल्कुल नए नज़रिए से देखने की कोशिश करेंगे। जैसे टूरिस्ट देखता है- हर चीज़ को ख़ासी बारीकी और जिज्ञासा से। तब हमें ज़रूर कुछ ऐसी चीज़ें मिल जाएंगी जो हमें भी अपने शहर पर नाज़ करने, उसे याद करने का मौका देंगीं।

इस विश्लेषण में मुझे पूरी उम्मीद है कि कई जगह आप मुझसे इत्तेफ़ाक नहीं रखते होंगे और मुझे इस बात की भी पूरी उम्मीद है कि आप अपनी टिप्पणी के ज़रिए अपनी बात भी रखेंगे। हो सकता है आप इसी पीढ़ी के हों और अपने शहर को शिद्दत से याद करते हों। हम आसानी से इस विश्लेषण में जोड़-घटाव कर सकते हैं...लेकिन आपकी मदद से ही।

Saturday, September 19, 2009

शशि थरूर- जो किया नहीं उसकी सज़ा


अब तक अख़बार और टीवी ही बरस रहा था, अब अपनी ब्लॉग की दुनिया भी थरुर की जान के पीछे हाथ धोकर पड़ गई है। जानते हैं,शशि थरुर की ग़लती क्या है- महज़ इतनी कि वो बेचारे अभी सरज़मीं-ए-हिन्दुस्तान की सियासी मिट्टी में ढंग से लोट नहीं लगा पाए हैं। इसलिए हमारी राजनीति के तौर-तरीक़ों से वाक़िफ़ नहीं है। मैं न तो थरूर का प्रवक्ता हूं और न ही उन्हें बहुत क़रीब से जानता हूं। सवाल बस ताज़ा विवाद पर उठाना चाहता हूं। पता नहीं जो थरूर पर बरस रहे हैं उनमें से कितने ट्विटर पर हैं और कितने उसके इंटरफ़ेस से परिचित हैं। मुझे क़रीब 8 महीने हुए हैं ट्विटर पर और लगभग इतना ही समय थरूर को फ़ॉलो करते हुए।
मोटा-मोटा समझिए तो ट्विटर पर आप जो लिखते हैं उसे ट्वीट कहा जाता है और आपके ट्वीट पर कोई जवाब दे सकता है या कुछ पूछ सकता है। इसके अलावा आप ट्विटर पर मौजूद लाखों लोगों में से जिसको चाहें फ़ॉलो कर सकते हैं यानी उनके ट्वीट्स आपके होमपेज पर नज़र आएंगे।
अब सुनिए, एक साहब हैं कंचन गुप्ता। चंदन मित्रा वाले अंग्रेज़ी अख़बार- पायनियर के असोसिएट एडिटर हैं। उन्होंने शशि थरुर से पूछ लिया-
# @ShashiTharoor- Tell us Minister, next time you travel to Kerala, will it be cattle class?
11:57 PM Sep 14th from TweetDeck in reply to ShashiTharoor

इस पर थरूर का जवाब था-
# @KanchanGupta- absolutely, in cattle class out of solidarity with all our holy cows!
12:17 AM Sep 15th from web in reply to KanchanGupta

ध्यान दीजिएगा कि कैटल क्लास शब्द थरूर ने इस्तेमाल नहीं किया है, ये महज़ जवाब है उस सवाल का जिसमें कंचन ने ये इस्तेमाल किया है। अब आप इसे आराम से मुद्दा बना सकते हैं कि थरुर को तो कंचन की बात का विरोध करते हुए ये लिखना चाहिए था कि ये आप क्या कह रहे हैं। इकॉनॉमी कोई कैटल क्लास थोडे ही होती है। आपने क्या देश के आम आदमी को मवेशी समझ रखा है। लानत है आप पर, वग़ैरह, वग़ैरह...लेकिन जैसा मैंने शुरु में कहा- अभी इस सियासी रज में लोट नहीं लगाई है सो बेचारे यहीं मात खा गए। लिख दिया- ज़रूर सफ़र करूंगा-मवेशी क्लास में, पवित्र गायों के साथ अपना सहयोग दर्शाते हुए।
अब कांग्रेस भी बिफर पड़ी ये सुन के। आप ग़लत समझे, सच पूछा जाए तो कांग्रेस कैटल सुन के थोड़े ही भड़की है वो तो Holy Cows को नहीं पचा पा रही। ऐसे कैसे कोई सोनियाजी और राहुलजी की यात्राओं का मज़ाक उड़ा सकता है-असल तकलीफ़ ये है। बाक़ी कैटल-वैटल जिए,मरे उसकी बला से। कांग्रेस का पैग़ाम साफ़ है- Holy Cows पर हाथ नहीं डालने का, क्या ! इस पूरे प्रकरण में मुझे, कम से कम यही लगता है कि थरूर की टिप्पणी एक सवाल का सहज, हास्यपूर्ण जवाब था, उससे ज़्यादा कुछ नहीं।

बाक़ी, इस पोस्ट के जिन पाठकों ने रेल की जनरल बोगी में सफ़र किया होगा, वो जानते होंगे कि असल कैटल क्लास क्या होता है। एक बात और। हम जनरल बोगी में कोई जानबूझ कर सफ़र नहीं करते- तब करते हैं जब या तो रिज़र्वेशन नहीं मिलता या इतना पैसा नहीं होता। जहां हम अभी भी सैकड़ों रेलगाड़ियों की हज़ारों जनरल बोगियों में लकड़ी की सीट पर दो इंच फ़ोम नहीं लगा सके वहां किस क्लास की बात कर रहे हैं।

कम से कम ब्लॉग की दुनिया में शशि थरुर के बहाने बहस इस बात पर होती कि हमारे यातायात के तमाम साधनों में किस क़दर क्लास बना दी गईं हैं और आम आदमी की औक़ात जानवर से ज़्यादा नहीं समझी जाती तो मुझे भी लगता कि ब्लॉग की दुनिया वाक़ई अलग है। लेकिन हमने तो अख़बार और टीवी की नकल ही की।

लेकिन उम्मीद है कि अगली बार कोई बहस अपने अंजाम तक पहुंचेगी और दूर तक देख सकेगी।

Wednesday, September 16, 2009

अगर अपने मोबाइल में दर्ज नम्बर खोना नहीं चाहते तो इसे ज़रूर पढ़ें

अगर आपका फ़ोन चोरी हो जाए, खो जाए या पानी में गिर जाए तो जो सबसे पहला ख़्याल आपको आता है, वो है- अरे मरे, गए सारे नम्बर्स। फिर शुरु होती है क़वायद वो सारे नम्बर्स इकट्ठा करने की। फिर भी सारे मिलते नहीं है। हां, अगर आपने अपने कम्प्यूटर पर बैकअप लिया है तो भी इस बात की संभावना है कि वो काफ़ी दिनों से अपडेट नहीं हुआ होगा। इसलिए 100-150 नम्बर फिर भी नहीं मिलेंगे।
आपकी इन सारी परेशानियों का एक जादुई इलाज है। एक वेबसाइट है- ज़ायब.कॉम। बस आपके फ़ोन में जीपीआरएस होना चाहिए। साइट पर जाइए, अकाउन्ट बनाइये, फ़ोन चुनिए, वो जो सेटिंग्स भेजेगा आपके फ़ोन पर, उसे सेव कीजिए और बस कर दीजिए सिंक- कुछ ही सेकेन्ड्स में सारे नम्बर्स का बैकअप ज़ायब पर। इतना ही आसान। उसके बाद दो-चार दिन में जब भी वक़्त मिले सिंक कर लीजिए- उन दो-चार दिनों में जो भी नए नम्बर आपकी फ़ोनबुक में जुड़े होंगे, ज़ायब पर सेव हो जाएंगे। ये सब जीपीआरएस पर हो रहा है तो सिंक के लिए आपको किसी कंप्यूटर के पास होने की भी ज़रूरत नहीं है।
अब ख़ुदा न खास्ता, आपके फ़ोन के साथ कोई भी दुर्घटना होती है, लेकिन आपके नम्बर हमेशा सेव रहेंगे। आप फ़ोन बदलेंगे तो भी आपको ज़ायब को सिर्फ़ ये बताना है कि भई मैंने नया फ़ोन लिया है, वो वही सेटिंग्स आपको नए हैंडसेट पर भेज देगा और लो सारे नम्बर नए फ़ोन में आ गए।
हां, सबसे ज़रूरी बात- इसके लिए आपको चुकाने होंगे सिर्फ़ 1000 रू. सालाना। क्या कहा, महंगा है। सच है, हम हिन्दुस्तानी कभी नहीं बदलेंगे।
मज़ाक कर रहा था, सेवा बिल्कुल मुफ़्त है (मुफ़्त में भी बिल्कुल लगाना पड़ रहा है, आपकी तसल्ली के लिए)। अब तो लेंगे न बैकअप।
कोई सवाल हो, इससे जुड़ा तो मुझे मेल कर सकते हैं- laughingprabuddha@gmail.com (कम्पनी मेरी नहीं है भइया, जानकारी अच्छी है इसलिए सहयोग कर रहा हूं ! ! ! पिछले डेढ़ साल में इसने कई बार मेरी जान बचाई है।)

Tuesday, September 15, 2009

वो फ़्लॉपी याद आती हैं !

आज सवेरे अलमारी में कुछ ढूंढ़ रहा था। जिसकी तलाश थी वो तो नहीं मिला, कुछ पुरानी फ़्लॉपी ज़रूर मिल गईं। अचानक मिली इन फ़्लॉपीज़ से मेरे होठों पर मुस्कान बिखर गई। कुल 8 फ़्लॉपी- 5 चालू हालत में थीं (इनका नाम किसने रखा, याद है आपको नए डिब्बे में भी 10 में से दो-तीन फ़्लॉप निकल जाती थीं) जिनमें कॉलेज़ के ज़माने की कुछ वर्ड फ़ाइल्स थीं। मुस्कान की वजह इनके अंदर का डेटा नहीं बल्कि उस डेटा का साइज़ था। कॉलेज ख़त्म हुए क़रीब 4 साल हुए हैं लेकिन इन 4-5 सालों में डेटा स्टोरेज किस क़दर बदल गया है ये फ़्लॉपी उसका सुबूत हैं। महज़ 1.44 एमबी, अब आप इस स्टोरेज क्षमता पर हंसने के अलावा और कर भी क्या सकते हैं। लेकिन याद कीजिए कुछ साल पहले यही फ़्लॉपी आपके कितने काम आती थीं। नए कंप्यूटर्स में तो फ़्लॉपी ड्राइव आना ही बंद हो गई। तब 128 एमबी पेन ड्राइव धारक भी दोस्तों के बीच ख़ूब धाक जमाता था। अब अगर कोई 1 जीबी पेन ड्राइव के साथ नज़र आता है तो आप कहते हैं, अरे, ज़्यादा मेमोरी वाली लेलो यार, बड़ी सस्ती हो गई हैं। एक टेराबाइट की पेन ड्राइव तक उपलब्ध है। एक टेराबाइट समझते हैं यानी 1024 जीबी यानी सात लाख अट्ठाइस हज़ार सात सौ छिहत्तर फ़्लॉपी। वो एक टीबी की पेन ड्राइव आपकी जेब में समा जाती है और सात लाख फ़्लॉपी?!?! मुझे लगता है कंप्यूटर्स की दुनिया में सबसे ज़्यादा बदलाव डेटा स्टोरेज में ही आया है। वो पहले से बहुत सस्ते और सुलभ हो गए हैं। और इसकी सीधी वजह छिपी है हमारी डेटा की बढ़ती ज़रूरतों में। अब आपको अपने अनलिमिटेड इंटरनेट कनेक्शन के ज़रिए डाउनलोड हुए टॉरेन्ट्स को भी तो स्टोर करना पड़ता है। पहले तो नज़दीक के साइबर कैफ़े में जाकर मेल चैक हो जाती थीं। अब मेल से भेजे गए फ़ोटो-वीडियो वगै़रह भी सेव करने पड़ते हैं ! फिर ताज़ातरीन संगीत डाउनलोड को कैसे भूला जा सकता है ! यानी कुल मिलाकर हालत ये रहती है कि उफ़, कंप्यूटर बार-बार यही कहता रहता है- 'लो मेमोरी, लो मेमोरी'। अरे, क्यूं परेशान करता है, मेरे भाई, 'ले लूंगा, ले लूंगा'। तब तक जो मूवी देख चुका हूं, डिलीट करता हूं न...आप भी तलाशिये, हो सकता है भूली-बिसरी कुछ फ़्लॉपी हाथ लगें। और तो पता नहीं लेकिन आप मुस्कुराए बिना नहीं रह सकेंगे।
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