Saturday, December 17, 2011

कच्ची शराब से मरे तो क्या मरे



45 मौत...फिर 73
फिर 93, 125, 143
और आख़िर में
170 पार
मक़तूलों* में शामिल थे
रिक्शेवाले, रेहड़ी वाले
और मुमकिन है कुछ भिखारी भी
मक़तूल..हां मक़तूल ही तो थे
जिन्हें बड़ी बेरहमी से
क़त्ल किया गया था
कच्ची शराब की हर बूंद
शिराओं में ज़हर घोल गई

170 पार !
रूखे सूखे आंकड़ों को
नंगे भूखे लोगों को
सियासत नहीं आती
बस छाती पीट कर
ग़म का इज़हार आता है
जहां सटल्टी नहीं होती
बस ग़म और गुस्से का
ज्वार होता है

इन चितकबरे बदसूरत लोगों को
टीवी का पर्दा मिलता है
कुछ मिनट ही
दिल्ली से 1500 किलोमीटर दूर
ख़बरों को जुटाना
महंगा पड़ता है काफ़ी
पर ये नासमझ कंबख़्त
मरने से पहले कहां सोचते हैं ये सब
तो अब भुगतो
कच्ची शराब की पक्की मौत

अरे नामुरादों
तुम्हें मौत भी आई तो कैसी
दोहरे शतक के नज़दीक हो
और दो ही मिनट की ख़बर
तुम्हें बतौर श्रद्धांजलि पेश की जाएगी
क्योंकि काउंटडाउन शुरु हो चुका है
भारत रत्न से एक क़दम दूर वाले
भगवान के महाशतक का
उधर रुपया डॉलर के मुकाबले
कितना कमज़ोर हो गया है जानते हो
कैसे जानोगे
होगा तो जानोगे न...
चिदंबरम पर वार तीखे हो चले हैं
पता है पता है, नहीं पता होगा तुम्हें
और वीना मलिक लापता हैं
मल्लिका -ए-टीवी वीना मलिक

अब चूंकि ये तुम्हारी
आख़िरी मौत तो है नहीं
तुम्हें कई बार और भी मरना है
तो अगली बार
इतनी बड़ी बड़ी ख़बरों से
टकराने की कोशिश मत करना
मौत से लिपटना ज़रूर
लेकिन हो सके तो
अदद वक़्त और जगह तय करके

और हां कच्ची शराब से तो बिल्कुल नहीं
बड़ी डाउनमार्केट है स्साली

मक़तूल--जिसको क़त्ल किया गया हो

Sunday, November 27, 2011

चलो आज जिया जाए


दूर तक खुले मैदान में
फेफड़ों में ताज़ा हवा लेके
हांफ कर गिरने तक
दौड़ का लुत्फ़ लिया जाए
चलो आज जिया जाए

कई घंटे की प्यास के बाद
मिनरल वॉटर की सारी बोतलें भूलकर
किसी खेत में ट्यूबवेल से
ओक भर पानी पिया जाए
चलो आज जिया जाए

अपार्टमेंट के 26वें फ्लोर की बालकनी से
काग़ज़ के दो टुकड़े गिराकर
कौन सा पहुंचेगा पहले
इस शर्त का मज़ा लिया जाए
चलो आज जिया जाए

मोबाइल, इंटरनेट से दूर
अख़बार, टीवी से दूर
जज़्बातों की बस्ती में
रिश्तों को बारीकी से सिया जाए
चलो आज जिया जाए


किसी अनजाने शहर में
बिल्कुल अकेले, तन्हा
अनजान निगाहों के बीच
कोई नया रिश्ता कायम किया जाए
चलो आज जिया जाए

अपने बच्चे के प्लेस्कूल में
किसी दिन कुछ देर ठहरकर
कुदरत की मासूमियत को
फिर से पिया जाए
चलो आज जिया जाए

छोटी सी है ज़िंदगी
छोटी छोटी हैं ख़ुशियां
छोटे हम, छोटे सपने
ज़िंदगी को रिटर्न गिफ़्ट दिया जाए
चलो आज जिया जाए

Monday, September 19, 2011

सस्ते आलसी शेर


और अब वादे के मुताबिक तीन वाहियात, सस्ते आलसी शेर:

1.ख़्वाहिशों की चादर ओढ़े सो रहा हूं कब से
    कमबख़्त नींद टूटे तो उन पर काम शुरु हो

2. अंगड़ाइयों से नींद खुलती नहीं मेरी
   बड़ी आलसी हैं अंगड़ाइयां मेरी

 3. मैं ठहरा कीबोर्ड का सिपाही
    बस ये एफ 5 दबाए काफी वक्त हुआ

राहुल द्रविड़ होने के मायने



इधर, बीते कुछ दिनों में मैंने तमाम अख़बार छान मारे, इस उम्मीद में कि राहुल द्रविड़ के वनडे संन्यास पर काफी कुछ बेहतरीन लिखा गया होगा। लेकिन मिला नहीं कुछ...सिवा एक ख़बर के तौर पर द्रविड़ की विदाई के। हां, एमजे अकबर का संडे गार्जियन में छपा लेख ज़रूर अपवाद रहा...वाकई एक उम्दा लेख। असल में, मैं ज़्यादा की उम्मीद लगा बैठा था। राहुल द्रविड़ का तो पूरा करियर ही ऐसा रहा है।

करीब आठ साल होने को आए....क्रिकेट से भागे हुए। पता नहीं क्यों, अब ये खेल सुहाता नहीं। लेकिन, क्रिकेट से अलगाव के इस दौर में भी मेरी दिलचस्पी इसमें रही कि द्रविड़ क्या कर रहे हैं। टीम का वो खिलाड़ी जो टीम मैन होने के मायने इतने ऊंचे कर देता है कि आप उसका कोई जोड़ ढूंढ़ नहीं पाते। वो खिलाड़ी जिसके लिए खेल एक इबादत की तरह है...खुदा को पा लेने की तरक़ीब है शायद। वो खिलाड़ी जिसे न जाने कितनी बार खुद को साबित करने के लिए कहा गया और उसने किया...बिना किसी शिकायत के..बिना बोले..चुपचाप। वो खिलाड़ी भी जिसके बारे में कहा जाता है कि किसी भी टूर पर उसका किट बैग सबसे भारी होता है...दसियों किताबें जो होती हैं उसमें।
कई क्रिकेट पंडित कहते हैं, ये राहुल द्रविड़ की बदकिस्मती है कि वो सचिन के दौर में पैदा हुए। पूरी विनम्रता के साथ मैं इन पंडितों की राय से इत्तेफ़ाक़ नहीं रखता। दरअसल, द्रविड़ की बदकिस्मती ये है कि वो उस दौर में खेल रहे हैं जब मीडिया के थालों में अगरबत्तियां महक रही हैं...जीहां, किसी को देवता बना देने की, पूजने की आदत बढ़ी है। सो, जब सचिन देवता हो गए तो बाक़ी लोगों को उनका 'ड्यू' नहीं मिल पाया। ऐसी सीरीज़ में भी जब वो सचिन से कहीं बेहतर खेले।

दीवार, मिस्टर कूल, मिस्टर डिपेंडेबल जैसे नाम तो दिए गए द्रविड़ को। लेकिन वो नहीं मिला जिसके वो हक़दार हैं। आप कैसे नज़रअंदाज़ कर सकते हैं एक ऐसे खिलाड़ी को जिसने टीम के लिए विकेटकीपिंग की...जब ज़रूरत हुई ओपन किया, जब ज़रूरत पड़ी नंबर 5 और 6 पर खेले। और हर भूमिका में अपना सर्वश्रेष्ठ दिया।
मुझे याद आता है वो वक्त जब द्रविड़ को वनडे का खिलाड़ी मानने से ही इनकार कर दिया गया था। कैसा तो रोने रोने जैसा होता था मन तब। लेकिन, हर महान खिलाड़ी की तरह वो वापस लौटे और देखते देखते टीम की रीढ़ बन गए।
और जब आज वो वनडे से जा रहे हैं तो अख़बारों से काट कर संभालने लायक एक भी लेख नहीं ढूंढ़ पाना अटपटा नहीं है। ये दरअस्ल, उसी चरण वंदना का हिस्सा है जहां कुछ नायकों को दूर की दुआ सलाम देकर ही विदा कर देने का रिवाज है। वो वन डे से जा रहे हैं 69 रनों की शानदार पारी के साथ...अब तैयार रहिए टैस्ट में कई और यादगार पारियां देखने के लिए।

राहुल द्रविड़, तुम महान हो !

Saturday, January 29, 2011

आप वरिष्ठ पत्रकार कहीं हम 'मूर्खों' की क़ब्र तो नहीं खोद रहे...

कुछ महीने पहले एक पत्रिका के लिए कुछ लिख कर देने के लिए कहा गया था...जब पहले पहल बोला गया कि लिखना है मीडिया पर...लगा मैं क्या लिखूंगा, क्या ढाई साल थोड़े कम नहीं है अनुभव के लिहाज़ से। लेकिन तुरंत ही अगले एहसास ने पहले को लगभग धूल चटाते हुए अपनी ज़मीन तय कर ली थी। यानि मुझे पता लग गया कि मुझे क्या लिखना है। वो सब जो पिछले ढाई साल से जज़्ब था शायद कहीं। मौक़ा ही नहीं दिया किसी ने शायद ये सोच कर कि पत्रकारिता की नई पौध बहुत निकम्मी, अज्ञानी और अहमक़ क़िस्म की है।

आइए, हम अहमक़ों के बारे में ग़लतफ़हमियां यक़ीन में बदलें, उससे पहले उन्हें दूर कर लें।

टीवी पत्रकार हूं तो बात अपने यहां की करुंगा लेकिन यकीं है कि हम 'मूर्ख' पत्रकार हर जगह फिर चाहे वो प्रिंट हो या टीवी, ख़ून के घूंट पीते होंगे, उबलते होंगे, गरियाते होंगे और फिर आ जाते होंगे...अगले दिन काम करने।

मेरे कई दोस्त छोड़ कर चले गए टीवी न्यूज़...कई कोई भी बेहतरीन मौक़ा मिलते ही छोड़ने की फ़िराक़ में हैं...अपने आसपास ज़रा ग़ौर से देखिए...दर्द बहुत गहरा है साहब...ये न तो ख़ामख़्वाह का स्यापा है...न ख़बरों की भाग दौड़ से दूर कहीं सुकून ढूंढ़ने की कोशिश। क्यूंकि जब उन्होंने इस दुनिया में क़दम रखा था विकल्प उनके पास तब भी मौजूद थे एमबीए करके कॉर्पोरेट दुनिया का हिस्सा बनने के या फिर कुछ और मां-बाप का सुझाया करने के।
लेकिन उन्होंने वो नहीं चुना, पत्रकारिता चुनी...जानते हैं, क्या सोच कर। ये कि हम कुछ बहुत अलग सी, अच्छी सी, नोबेल चीज़ का हिस्सा बनने जा रहे हैं। और फिर साल-दो साल की पढ़ाई और इतने ही वक़्त का काम जोश के सारे गुब्बारों को सुई चुभो चुभो कर फोड़ डालता है। क्यूंकि वो सब ये करने तो क़तई नहीं आए थे, चैन की ज़िंदगी को छोड़ कर।

ऐसा भी नहीं कि वो नासमझ क्रांति करना चाहते थे, वो तो बस जर्नलिज़्म करना चाहते थे...सीधा-सादा, बिना मिलावट का जर्नलिज़्म। इससे ज़्यादा की ख़्वाहिश नहीं थी उनकी। इस अजीब माहौल में जब हौसले के लिए अपने से वरिष्ठ की तरफ़ देखा गया तो या तो दुनियाबी ज्ञान मिला या बेबसी। तो क्या, सालों के अनुभव वाले पेड़, बढ़ती हुई पौध को संरक्षण नहीं दे सकते। शायद, उनमें दम नहीं है इतना। ख़ैर, जो पत्रकारिता छोड़ कर चले गए, भगवान उनकी पत्रकार आत्मा को शांति दे, कॉर्पोरेट आत्मा को उन्नति दे।

एक और भाव जो ज़्यादातर वरिष्ठ पत्रकारों के चेहरे पर चिर-चस्पा रहता है वो है...नए पत्रकारों की जानकारी का मखौल। यानि जो नम्बूदरीपाद, कानू सान्याल, कालाहांडी, संथाल विद्रोह, राजीव गोस्वामी के बारे में नहीं जानता, वो स्साला पत्रकार कैसे हो गया। अब जो पांच-सात साल की टीवी ख़बरों के बीच पांच बार भी ऐसे नामों से रू-ब-रू नहीं हुआ और जिसे टीवी पत्रकार बनने के बाद भी ऐसे नामों से दूर रहना है, उसके कौन से ज्ञान का इम्तेहान लेना चाहते हैं आप। पूछना ही है तो ये पूछिए कि राखी सावंत ने जिस दिन अपने बॉयफ़्रेंड को थप्पड़ मारा था, उसके विजुअल का टेप नंबर क्या है। पूछिए कि जो बच्ची विषकन्या है, सांप सपेरों के बीच रहती है, जिसने डेढ़ महीना पहले छप्पड़ फाड़ के टीआरपी दी थी वो हमने पिछले हफ़्ते कब कब रिपीट किया था। पूछिए कि रणबीर-दीपिका के अलगाव की ख़बर के लिए इस समय बैकग्राउंड में कौन सा गाना फ़िट रहेगा। और जब वो इन सवालों के जवाब देने में नाकाम रहे तो आपको पूरी छूट है उसकी जानकारी का मखौल उड़ाने की। उस बेचारे को काहे आप इन 'सीरियस' चीज़ों में उलझाते हैं।
सोचिए साहब सोचिए वरना कुछ सालों बाद ये साली नई पौध पत्रकारिता के ताबूत में पड़ी लाश को आप ही के पते पर पार्सल करेगी ये सोच कर कि आपका कोई चहेता रिश्तेदार शायद न्यूज़रूम में छूट गया है !

Tuesday, January 18, 2011

मेरे ख़ुदा, मुझे माफ़ करना, उन सारे मौक़ों के लिए जब मैंने तुझे कोसा हो !


फ़रीदाबाद स्टेशन....प्लेटफ़ॉर्म पर काफ़ी भी़ड़ थी। वैसे भी सर्दियों में प्लेटफ़ॉर्म ठसाठस ही रहते हैं। आगरा के रास्ते में था मैं। अपनी पसंदीदा-विंडो सीट पर बैठा हुआ। गाड़ी रुकने पर खिड़की से बाहर झांका। नज़रें तमाम व्यक्तित्वों और दृश्यों का मुआयना करते हुई जहां ठिठकीं वो तस्वीर शायद दिमाग़ के किसी हिस्से में हमेशा ताज़ा रहेगी। और मैं शिद्दत से चाहता हूं कि ऐसा ही हो क्यूंकि अगर ऐसा नहीं हुआ तो मुमकिन है मैं ज़िंदगी में भगवान को वक्त बेवक्त गालियां दूं।
बड़ी-बड़ी आंखें- ज़िंदगी में डूबी हुई, ख़ूबसूरती शायद इसी को कहते हैं, जिसे देख कर ये लगे--ऐसी थी वो लड़की। खिलखिलाहट से भरी हुई। अपने मां-बाप, रिश्तेदार जो भी रहे हों उनसे बातचीत में तल्लीन। ज़िंदगी को पूरी तरह जीना आता होगा उसको।

व्हील चेयर पर थी वो लड़की, हाथ भी पूरी तरह काम नहीं कर रहे थे।

मेरे ख़ुदा, मुझे माफ़ करना, उन सारे मौक़ों के लिए जब मैंने तुझे कोसा हो।, माफ़ करना उन तमाम 'काश' के लिए जो मैंने अक्सर ही लगाए। मेरे हाथों की सारी उंगलियां ठीक से काम करती हैं। मैं चल सकता हूं..दौड़ सकता हूं, उछल सकता हूं। मेरा दिमाग़ ठीक तरह से काम करता है। सही जगह पर धड़कता हुआ एक अदद दिल है। चाहने वाले कुछ दोस्त हैं, परिवार है।  और क्या चाहिए मुझे ज़िंदगी जी लेने के लिए। हां, मैं दुनिया का सबसे ख़ूबसूरत इंसान नहीं हूं, न बहुत लंबा, न मोटा बैंक बैलेंस, न पुरखों की जायदाद ही। क्या ये सब मेरे ख़ुश रहने के बीच आने चाहिए? पर मैं जानता हूं, मेरे मालिक, कि मैं इंसान हूं सो एहसाऩफ़रामोश भी। तो इतने पर भी कई बार तुझे कोसना चाहूंगा, लेकिन कोसूंगा नहीं क्यूंकि मुझे फ़रीदाबाद के प्लेटफॉर्म पर देखी वो खिलखिलाती लड़की बहुत याद आयेगी। और मैं, परेशानी कितनी भी बड़ी हो, उससे दो-दो हाथ करने के लिए तैयार हो जाउंगा।
और हां, तूने जैसा बनाया, उसके लिए बहुत शुक्रिया !

Saturday, January 8, 2011

11 करोड़ का गंभीर बनाम 50 रुपये किलो का प्याज़


सुबह के करीब ग्यारह बजे होंगे। अपने क्षेत्रीय चैनल की डेस्क पर साढ़े बारह बजे महंगाई पर होने वाले शो की रूपरेखा बनाई जा रही थी। सरकार के तमाम दावे कैसे महंगाई डायन को रोकने में नाकाम हो रहे हैं, कैसे प्याज़ किसी के क़ाबू में नहीं आ रहा वग़ैरह, वग़ैरह। ये सब तय हो ही रहा था कि कुछ मीटर की दूरी से एक तेज़ चीख़ ने कानों के पर्दे पर अतिरिक्त वाइब्रेशन पैदा कर दी। गौतम गंभीर- 11 करोड़ 4 लाख। ये चीख़ नेटवर्क के नेशनल चैनल से आई थी। अचानक याद आया कि अरे हां, आज तो आईपीएल 4 की नीलामी का दिन है। फिर तो चीख़ों का सिलसिला थमा ही नहीं। यूसुफ़ पठान, युवराज सिंह, एबी डि विलीयर्स, रॉस टेलर। सबके साथ करोड़ों का एक टैग चस्पा। मैं चूंकि दिल्ली-एनसीआर के चैनल से वास्ता रखता हूं तो गौतम गंभीर के सबसे महंगे बिकने और दिल्ली डेयरडेविल्स की बजाय कोलकाता से खेलने की ख़बर अहम हो गई। तय किया गया कि हर बार टॉप ऑफ़ द व्हील यही ख़बर चलेगी। यानि हर बुलेटिन की पहली ख़बर। फ़ोनो लो, कुछ रियेक्शन्स मंगा लो कि दिल्ली वाले कितने मायूस हैं, इस ख़बर से। क्रिकेटरों की महामंडी से एक के बाद आंकड़े आते जा रहे थे। प्याज़-टमाटर की महंगाई का मुद्दा ऐसे आंकड़ों के सामने रखने भर से छोटेपन का एहसास हो रहा था। अरे, अपने देश में करोड़ों की मंडी सजी है और अपन न जाने क्यूं इस प्याज़-टमाटर से ऊपर ही नहीं उठ पा रहे। बड़ी छोटी सोच है हमारी।
अचानक न्यूज़ चैनलों के मायावी पर्दों से प्याज़ ग़ायब होने लगा। सब्ज़ीमंडी की जगह सज चुकी थी क्रिकेट की महामंडी। समझ आ गया कि कम से कम अगले दो दिन तक महंगाई की मजाल है कि ख़बरिया चैनलों को छू तक ले। और बेचारा 50 रुपये किलो का प्याज़ हिम्मत करे भी तो कैसे? मरगिल्ला प्याज़ क्या खाकर पछाड़ेगा 11 करोड़ के गंभीर को? 18.32 फ़ीसदी की खाद्य महंगाई दर भी थर-थर कांपने लगी है इस नीलामघर के रोब के आगे।
फ़रवरी मे देशवासियों को वर्ल्ड कप के महाकुंभ की सौगात मिलेगी और फिर मिलेगा आईपीएल का बुख़ार। यानि ये महंगाई-वहंगाई जैसे मनहूसियत भरे शब्द अब बस विदा लेने को हैं। धन्य है क्रिकेट, धन्य है बाज़ार और धन्य है मेरा मुल्क़।

Saturday, December 25, 2010

मेरी प्रेम कहानी का डिज़ायनर कमीना निकला !


मेरे क्यूबिकल से बस एक झलक मिलती थी
वो उन दिनों कमाल लगती थी
कनखियों से देखता था कभी
और गुज़रता था बेहद करीब से कभी
मैं शुक्रगुज़ार हूं दफ्तर के डिज़ायनर का 
कॉरीडोर संकरे बनाए हैं काफी
मैं देर तक खड़ा होता था वॉटर कूलर के पास
कि वहीं से मिलती थी उसकी पूरी झलक
ज़ुल्फ़ की वो एक लट मैं कितनी बार
कान के पीछे रख कर आया
ठीक से मुझे भी याद नहीं
ये सब होता रहा वहीं.
खड़े खड़े वॉटर कूलर के पास
मैं शुक्रगुज़ार हूं दफ़्तर के डिज़ायनर का
कि उसने वॉटर कूलर के लिए वो जगह तय की

कैफ़ेटेरिया की कोने वाली टेबल उसकी फ़ेवरेट थी
जिसके पास ही से लेना होता था खाना
मैं खाना लेते हुए कनखियों से देख लेता था
मैं शुक्रगुज़ार हूं दफ़्तर के डिज़ायनर का
उसने वेन्डर को खाना सर्व करने के लिए वो जगह दी

फिर एक दिन...
मैं सुट्टा ब्रेक के लिए बाहर था
मोबाइल स्क्रीन पर फ्लैश हुआ
हलकट कॉलिंग...
बॉस का फोन था
फोन उठाया, आवाज़ आई--
आई वॉन्ट यू हियर इन 5 मिनट्स
कुछ क्राइसिस थी शायद
अधजली सिगरेट जूते के नीचे शहीद हुई
और मैं ऊपर की ओर भागा
लिफ्ट का दरवाज़ा मेरे फ्लोर पर खुला
जिसके ठीक बग़ल में था
ऑफिस में एंट्री का दरवाज़ा
लिफ्ट खुलते ही मैं बाहर लपका
और वो...
उसे कम्बख्त उसी लिफ्ट में जाना था
हां तो मै कह रहा था..
लिफ्ट खुलते ही जो मैं लपका हूं
बुरी तरह टकरा के गिरा हूं
और गिराया है उसे भी
मैं ऊपर झुका हूं उसके
बॉस का फोन फिर बजा है इस बीच
लेकिन मैं तो ब्लैंक हूं
वो एक लम्हा जैसे वहीं रुक गया है
कि तभी,ऐसी सिचुएशन में, हिंदी फिल्मों की
मेरी सारी जमा पूंजी को कच्चा चबाते हुए
उसीके मुखारविंद से फूटा है
हिंगलिश गालियों का पूरा लॉट
एक भी गाली ऐसी नहीं
जिससे डक करके बच सको
उसी के शब्दों में--
&^^%%$%#%#@$#@@@%^$
U scoundrel! Can't u see properly?
सकपकाया हुआ उठा हूं मैं
और नीची नज़रों से भागा हूं बदहवास

बॉस की तरफ़ बढ़ते हुए
गरिया रहा हूं जी भर के
दफ़्तर के डिज़ायनर को
साला %*%&(^%%$^$^#@%^%@

लिफ्ट को कहीं और नहीं बना सकता था !

Saturday, November 6, 2010

इन सर्दियों में नहीं रहा वो


नसों में बहता ख़ून जम रहा था आहिस्ता आहिस्ता
और थरथराते होठों से जब तब आधे अधूरे
कुछ लफ़्ज़ गिरते थे ज़मीं पर
छनाके के साथ टुकडा टुकड़ा हो जाते थे सब
हाथों ने हिलना बंद कर दिया था
हां, आंखों की पुतलियां ज़रुर
दांएं-बांए कभी चक्कर लगा आती थीं
लेकिन इन इशारों का कोई सिरा,
नहीं पकड़ पाया कोई
कि पकड़ पाता तो
ज़िंदगी का हर क़तरा बर्फ न बन पाता
कि पकड़ पाता तो
रगों में बहता ख़ून बहने लायक रहता
इन सर्दियों में नहीं रहा वो
कनॉट प्लेस के इनर सर्किल में
मोंटे कार्लो शोरुम के ठीक बग़ल में
पड़ा है जिस्म, कोई हलचल नहीं है
लगता है ठंड ने चलाई है दरांती रात भर

Tuesday, September 14, 2010

भोपाल लेक पर...उस रोज़



भोपाल लेक में डूबता सूरज
प्यारा लग रहा था उस रोज़
डूबते हुए लाल गोले के
कुछ छींटे तुम्हारे चेहरे पर आ पड़े थे उस रोज़
उस रोज़ तुमने लेक के पानी में
शायद तीन बार उंगलियों से मेरा नाम लिखा था
बोटिंग नहीं की थी हमने उस रोज़
मैने हाथ पकड़ा था तुम्हारा
तुमने घबरा कर हाथ छुड़ाया था उस रोज़
हंस कर कहा था- मैं कहीं भाग थोड़ी रही हूं
मैं भी हंसा था, कहा- ये हाथ ज़िंदगी भर नहीं छोड़ूंगा

वो कॉर्नर वाले रेस्ट्रां की लेक फेसिंग टेबल पर
हमने कॉफ़ी और सेंडविच का ऑर्डर दिया था
वेटर चौंक पड़ा था उस रोज़
जब तुमने बिल पे किया था
उसे क्या पता था कि हमारे दरमियां
फॉर्मेलिटी जैसा कुछ नहीं
बस प्यार है ढेर सारा
उसे शायद आदत नहीं थी ये देखने की
तुम कितना हंसी थीं, उसके चले जाने के बाद
लाल सूरज डूब चुका था अब तक
बस उसकी लालिमा ज़िंदा थी
तुम्हारे चेहरे पर उस रोज़

रेस्ट्रां से निकलते हुए
उस धुंधलके में तुम्हें दिखा था कैंडीफ्लॉस वाला
सड़क के उस पार खड़ा था वो उस रोज़
तुम्हारी पसंदीदा चीज़ों में से एक़
बस..तुम ज़िद्दी बच्चे की तरह
हाथ छुड़ा कर भागी थीं
और
और
ट्रक...टक्कर...ख़ून..शोर
मैं इस ओर सड़क पर ही
गिर पड़ा था
सन्नाटा पसर गया था मेरे कानों में उस रोज़
मैं माफ़ नहीं कर पाउंगा ख़ुद को कभी
मैंने हमेशा हाथ थामे रखने का वादा किया था
क्यूं तुम्हारा हाथ छोड़ दिया फिर
उस रोज़