Wednesday, March 25, 2009

राष्ट्रीय फूल को बदल क्यों नहीं देते- आदर्श आचार संहिता कुछ यूं भी हो सकती है !



चुनाव आयोग का आदर्श आचार संहिता नाम शस्त्र कई बार बड़े अजीब क़िस्म के हालात पैदा कर देता है। अब देखिए न, कहा जा रहा है कि स्कूलों की दीवार से कमल का फूल, घड़ी, साइकिल और दूसरे तमाम चित्र जो किसी पार्टी का चुनाव चिन्ह हो सकते हैं, उन्हें मिटाना होगा। ये आचार संहिता के उल्लंघन के दायरे में आता है। बच्चा जब पूछेगा, सर हमारा राष्ट्रीय फूल कौन सा है? तो जवाब में शायद मास्साब कह दें, बेटा, मेरी मजबूरी समझ...गर्मी की छुट्टी के बाद पूछ लेना...सब बता दूंगा। ये सारे नियम उनके लिए भी जिनकी न तो अभी वोट डालने की उम्र है और न ही वो अपने घरों में मत को प्रभावित करने की ताक़त रखते हैं। तो फिर ये बवाल काहे के लिए...ख़ैर ये देखते-सोचते मुझे लगा कि अगर चुनाव आयोग आचार संहिता को लेकर थोड़ा और गम्भीर हो गया तो उसके क्या नतीजे हो सकते हैं। मुमकिन है कि ऐसे कुछ आदेश जारी कर दिए जाते -

1. कमल नाम के सभी लोगों को चुनाव तक नज़रबन्द किया जाए क्यूंकि पब्लिक में उनका नाम पुकारे जाने पर ख़ामख़्वाह दल विशेष को फ़ायदा पहुंचता है !

2. भारत सरकार औपचारिक तौर पर घोषणा कर राष्ट्रीय पुष्प को बदले !

3. कीचड़ में कमल खिलता है जैसे मुहावरों का प्रयोग नहीं किया जा सकता है। हां, इसकी जगह कीचड़ में नेता खिला लो, हम कुछ नहीं कहेंगे !

4. सभी नागरिकों को शॉल ओढ़ कर रहना होगा। हम जानते हैं कि गर्मी में ये थोड़ा मुश्किल है इसलिए इसकी जगह सूती कपड़े को भी ओढ़ा जा सकता है। पहनने का तरीक़ा शोले की डीवीडी देख कर ठाकुर से सीखें। उद्देश्य साफ़ है- इससे आपके हाथ नज़र नहीं आएंगे और एक दल को अनचाहा प्रचार नहीं मिल पाएगा। सरकार सूती कपड़े और शोले की डीवीडी पर सब्सिडी दे !

5. बिना रुकावट जारी घरेलू हिंसा करने वालों को ताकीद दी जाती है कि वो हाथ न उठाएं। इससे कोमल गालों पर छपा निशान अगर किसी को नज़र आया तो आचार संहिता का उल्लंघन होगा। हमें उम्मीद है कि इससे घरेलू हिंसा के मामलों में भी कमी आएगी !

6. साइकिल धारक नागरिक, हथियार धारक नागरिकों की तरह अपनी साइकिलें जमा करवाएं। वो या तो ग़ैरमौजूद पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल करें या फिर नई नवेली नैनो को भी घर ला सकते हैं। पर साइकिल क़तई नहीं !

7. गांवो और शहरों में मौजूद सभी हाथियों को अपना निशान लगा कर पास के जंगलों में छोड़ दें। शहरों में उनमें जनमत प्रभावित करने का माद्दा नज़र आता है !

8. जिन गांवों में अब तक बिजली नहीं पहुंची है वो समझ लें कि अंधेरा दूर करने के लिए लालटेन का इस्तेमाल वर्जित माना जाएगा। वो मोमबत्ती उपयोग कर सकते हैं या फिर नोकिया के फ़्लैशलाइट वाले मोबाइल भी !

आख़िर में जनता जनार्दन से अपील है कि वो भी हमें अपने सुझाव दे।

Saturday, March 21, 2009

मुझे मशहूर होना है



मैं भी सोचता हूं
लिखूं कोई कविता,गीत
या फिर एक शेर भला सा
जिसमें चांद हो, तारे हों, फूल हों
हो एक तोला 'माही वे' रत्ती भर 'मौला'
और हों कुछ प्यार की बातें
लिखूं वो कि जिसे सुनकर
कोई बरबस बजा दे ताली
करे वाह-वाह
हर तरफ़ मेरी ही जय हो !
कुछ तो ऐसा लिखूं कि
करन जौहर या यश चोपड़ा
कर लें मेरे लिखे गीत
अपनी फ़िल्म में शामिल
और हो जाऊं मैं उनकी तरह...
मशहूर

मैं जला रहा हूं आजकल
अपना लिखा वो सब
जिसे सुन कर कहीं ताली नहीं बजती थी
कहीं नहीं होती थी वाह-वाह
बस...
सन्नाटा सा पसर जाता था
ख़ामोशी
जो टूटने का नाम लेती थी
शरीर काठ में बदल जाते थे

अब छत पर कटती हैं रातें
देखते हुए चांद को
इस कोशिश में कि
मुझे भी दिख जाए उसमें
परी, नूर या रोटी ही सही
मेरे काम रहा है
'मौला'
गुंथ रहा है
कभी मुखड़े तो कभी अंतरे में

...मुझे भी मशहूर होना है

Sunday, March 15, 2009

फ़िल्म समीक्षा : गुलाल


Unapologetic, cares two hoots about everyone including the censors…if it thinks his films can’t do without an ‘A’ then be it...Here is one man who would not stoop low to please the producers or censors or moral brigade even if it takes five years to get his films released. That you call the power of conviction and that precisely is the reason why you have to have an opinion on his films and that too a strong one: unbearable or excellent, most of the time.


Gulaal, Anurag Kashyap’s latest outing in an election year is bound to create ripples for all the right reasons. The opening scene sets the tone for the story: Rajputana is to be freed as the Indian Govt has not only snatched the Princes’ privy purses but also failed to deliver on promises. Dukey Bana(Kay Kay) is the chosen man for the job. From the bigger picture to the not so bigger: student politics. A seedha-sada boy, Dileep(Raja Singh Chaudhary) who comes to study in Rajpur is sucked into politics after being stripped and ragged. He gets a crash-course in duniyadari from his room-mate, Rananjay Singh Ransa (Abhimanyu Singh) who is the angst ridden son of an erstwhile king. Dukey Bana is the uncrowned king of the town. He convinces Ransa to contest university election who finds his own illegitimate sister, Kiran (Ayesha Mohan) against him. He is killed by Karan ( Aditya Srivastava), his illegitimate brother who has some big plans for himself and his sister. Dileep is made to replace Ransa and win a rigged election by Dukey Bana. And from here starts Dileep’s journey downhill. He is seduced by Kiran to her advantage. She becomes the General Secy. of the union who later goes on to seduce Dukey Bana coz her brother, Karan wants to replace him as the senapati of the free Rajputana movement. The dirty game of politics becomes a bit heavy for Dileep who is already dejected by Kiran’s betrayal.


Gulaal has some bloody red (passionate) performances. Kay Kay as Dukey Bana steals the show whichever frame he stands in. Abhimanyu Singh gives an in-your-face performance who by the way, is also given some of the finest dialogues that he delivers with panache. Dileep’s character leaves a little more to be desired though he leaves an impact and is certainly a lambi race ka ghoda. Aditya as the restrained rogue is awesome. Mahie Gill in a loud cameo is lovable. Ayesha Mohan is the find of the film. Ah, this gives me immense pleasure- yes, Deepak Dobriyal as the right hand man of Dukey Bana and Piyush Mishra, the lost-in-his-own-world brother of Dukey Bana. One, who speaks also when he is silent and the other who utters gibberish and makes sense. Jesse Randhawa doesn’t get much scope in her ill drawn character of a ragged teacher.


If the first half gives you no time to look who is sitting next to you, the second half is a little sluggish. The film handles too many issues at one go- student politics, ragging, separatist state movements (you will be clearly reminded of Raj Thackeray in one scene where Dileep tells Dukey Bana that Rajputana is not for the Rajuputs alone) illegitimate children of the royals and hunger for power. Kudos to Piyush Mishra for Gulaal’s music and lyrics which give the film its authenticity, force, appeal and help take the narrative forward. The film not only has the best of lyrics but also the acidic dialogues (lend an ear!) And hey, like all his films, Gulaal too is high on metaphors. Just do yourself a favor- try to find as many as you can. A little observation and attention in the scenes and I promise you a smile on your face, enriching your movie watching experience. BTW, the first time Kiran meets Dileep asking for favors, the background wall screams of a lager beer ad- Democracy Lager- for strong people! ! !


Don’t go for this film if you are looking for some light entertainment. It won’t give you any. It hits you hard… hard in your face, tough on your heart, thought provoking for your brain.Watch it for some original brainwash !

(I wrote this post initially for http://newdelhifilmsociety.blogspot.com )

Saturday, March 14, 2009

जिसके हम मामा हैं ! - चुनावी दाल में व्यंग्य का तड़का

शरद जोशी हिन्दी के उन लेखकों में से हैं जिन्होंने अपनी कलम ऐसे विषयों पर चलाई जिन पर दूसरे साहित्यकारों की नज़र नहीं जाती। इसके लिए व्यंग्य से बेहतर विधा नहीं हो सकती थी और शरदजी के तराशे व्यंग्यों की तीखी चोट आपको न सिर्फ़ परेशान करती है बल्कि झंझोड़ देती है।
चुनावी मौसम में उनकी एक बेहतरीन रचना आपके साथ बांट रहा हूं।


एक सज्जन बनारस पहुंचे। स्टेशन पर उतरे ही थे कि एक लड़का दौड़ता आया।
मामाजी ! मामाजी ! - लड़के ने लपक कर चरण छुए।
वे पहचाने नहीं। बोले- "तुम कौन ?"
"मैं मुन्ना।" आप पहचाने नहीं मुझे ?
"मुन्ना ?" वे सोचने लगे।
"हां, मुन्ना। भूल गए आप मामाजी। ख़ैर, कोई बात नहीं, इतने साल भी तो हो गए।"
"तुम यहां कैसे ?"
"मैं आजकल यहीं हूं।"
"अच्छा"
"हां।"
मामाजी अपने भान्जे के साथ बनारस घूमने लगे। चलो, कोई साथ तो मिला। कभी इस मंदिर, कभी उस मंदिर। फिर पहुंचे गंगाघाट। सोचा नहा लें।
"मुन्ना, नहा लें ?"
"ज़रूर नहाइए मामाजी। बनारस आए हैं और नहाएंगे नहीं, ये कैसे हो सकता है ?"
मामाजी ने गंगा में डुबकी लगाई। हर-हर गंगे।
बाहर निकले तो सामान ग़ायब, कपड़े ग़ायब। लड़का...मुन्ना भी ग़ायब !
"मुन्ना... ए मुन्ना !"
मगर मुन्ना वहां हो तो मिले। वे तौलिया लपेट कर खड़े हैं।
"क्यों भाई साहब, आपने मुन्ना को देखा है ?"
कौन मुन्ना ?
"वही जिसके हम मामा हैं।"
"मैं समझा नहीं।"
"अरे, हम जिसके मामा हैं, वो मुन्ना।"
वे तौलिया लपेटे यहां से वहां दौड़ते रहे। मुन्ना नहीं मिला।

भारतीय नागरिक और भारतीय वोटर के नाते हमारी यही स्थिति है मित्रों ! चुनाव के मौसम में कौई आता है और हमारे चरणों में गिर जाता है। मुझे नहीं पहचाना ? मैं चुनाव का उम्मीदवार। होनेवाला एमपी। मुझे नहीं पहचाना। आप प्रजातंत्र की गंगा में डुबकी लगाते हैं। बाहर निकलने पर आप देखते हैं कि वह शख़्स जो कल आपके चरण छूता था, आपका वोट लेकर ग़ायब हो गया। वोटों की पूरी पेटी लेकर भाग गया।

समस्यायों के घाट पर हम तौलिया लपेटे खड़े हैं। सबसे पूछ रहे हैं- क्यों साहब, वह कहीं आपको नज़र आया ? अरे, वही जिसके हम वोटर हैं।
पांच साल इसी तरह तौलिया लपेटे, घाट पर खड़े बीत जाते हैं।

Saturday, March 7, 2009

अद्भुत गीतों में रंग देगा ये 'गुलाल'



And we thought, of late, only Prasun Joshi could write lyrics with unconventional imagery. Not any more. Just go grab a CD of Gulaal and you will realize what I mean. In the last decade I haven’t listened to more powerful lyrics or such a radical, out of the world imagery. Those who came in late, Gulaal is a movie on politics and democracy set in Rajasthan directed by Anurag Kashyap releasing on 13th March.
The lyrics have been penned by Piyush Mishra, the same man who won Filmfare for Best Dialogues for The Legend of Bhagat Singh. He has penned 8 songs and hold your breath, composed them. And what if I tell you that he has lent his wonderful voice to some of them... Yes, versatility doesn’t get any better. Poetry in some songs gets your hair stand on ends. Piyush has written something that would easily put him in the category of greats just for this one film, even if he goes on to write nothing as great after this (hope not). By now you must be thinking what I am up to. Has he hired me to do his PR? No, he hasn’t. Its just that sometimes you come across works which have that other world feel about them- unconventional, revolutionary, innovative, ground-breaking. Take a look at the following from the song, Shahar:

सुनसान गली के नुक्कड़ पर जो कोई कुत्ता चीख़ चीख़ कर रोता है
जब लैम्प पोस्ट की गंदली पीली घुप्प रोशनी में कुछ कुछ सा होता है
जब कोई साया ख़ुद को थोड़ा बचा बचा कर गुम सायों में खोता है
जब पुल के खंभों को गाड़ी का गरम उजाला धीमे धीमे धोता है

तब शहर हमारा सोता है….तब शहर हमारा सोता है
Or
इधर चीख़ती है इक हव्वा ख़ैराती उस अस्पताल में बिफ़री सी
हाथ में उसके अगले ही पल गरम मांस का नरम लोथड़ा होता है

जब शहर हमारा सोता है
तो मालूम तुमको हां क्या क्या क्या होता है
Now you know what I meant. Its not false praise. He deserves all the accolades for this. Another song- Duniya is a tribute to Sahir Ludhianvi and other greats. It gets its inspiration from Yeh duniya agar mil bhi jaye to kya hai from Pyaasa. The song is original in lyrics and music. Piyush renders the song in his own inimitable way. It’s a pleasure to hear Duniya will be an insult to the song… Its much more than that. An experience that compels you to revisit it many a time.
ग़ालिब के मोमिन के ख़ाबों की दुनिया
मजाज़ों के उन इंक़िलाबों की दुनिया
फ़ैज़, फ़िराक़ ओ साहिर ओ मख़ूदम
मीर की ज़ौक़ की दाग़ों की दुनिया
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है


Piyush knows well how to describe siski of a seductress. And how exactly does he do this in the composition- Beeda laced in Rekha Bhardwaj’s vocals- a voice that seduces you to the core.. See for yourself.
संकट ऐसा सिलवट से कोई हाल भांप ले जी
करवट ऐसी दूरी से कोई हाथ ताप ले जी
निकले सिसकी जैसे बोतल का कार्क जो उड़ा हो
धड़कन जैसे चंबल में घोड़ा भाग जो खड़ा हो
अंगिया भी लगे है जैसे सौ सौ मन का भार
मन बोले चकमक, हाय चकमक, चकमक......


One song that catches you unaware and makes your expressions taut is—Aarambh, a song which has all the attributes of becoming a sort of anthem:
आरंभ है प्रचंड, बोले मस्तकों के झुंड
आज जंग की घड़ी कि तुम गुहार दो
आन बान शान या कि जान का हो दान
आज इक धनुण के बाण पे उतार दो

मौत अंत है नहीं तो
मौत से भी क्यूं डरें
ये जाके आसमान में दहाड़ दो
जिस कवि की कल्पना में ज़िंदगी हो प्रेम गीत
उस कवि को आज तुम नकार दो....


I don’t know which genre do we put a song like Ranaji in, its full of political allusions. Go thru this track with a broad smile on your face:
राणाजी हमरे गुस्से में आए
ऐसो बलखाए
अगिया बरसाए
घबराए म्हारो चैन
जैसे दूर देस के टावर में घुस जाए रे एरोप्लेन

सजनी को डीयर बोले
ठर्रे को बीयर बोले
मांगे है इंगलिस बोली
मांगे है इंगलिस चोली
जैसे बिसलेरी की बोतल पीके बन गए इंगलिस मैन
...जैसे हरेक बात पे डेमोक्रेसी में लगने लग गए बैन
...जैसे सरे आम इराक़ में जाके जम गए अंकल सैम


There are three other songs as magnificently done as the above. The best thing about Piyush and his lyrics is that he doesn’t carry any baggage. He is a free spirited soul who writes what he believes is correct. That’s why sometimes the imagery doesn’t fit in your general conscience the first time you hear it but once comprehended, you bow for the master writer. As for the music, Piyush’s minimalist music in veer-ras songs not only complements the vocals but actually enhances the whole impact multifold. He has given a unique flavor to the album using Rajasthani folk wherever necessary, just what the doctor (in this case, AK) prescribed.

But one thing I fear dreadfully is that the album might die in the hands of a niche audience. The purpose of this post is to let you all know that there are gems waiting to be picked, waiting for your patronage, waiting to immerse you in an unheard of lyricism and imagery. Poetry never sounded this pure and beautiful. The last time it got any of my hair stand was when I was in school…. Hats off to Piyush and Anurag Kashyap for giving us sounds which I don’t know come from where but not from the typical Bollywood for sure.

(I wrote this post initially for www.newdelhifilmsociety.blogspot.com)