Saturday, December 25, 2010

मेरी प्रेम कहानी का डिज़ायनर कमीना निकला !


मेरे क्यूबिकल से बस एक झलक मिलती थी
वो उन दिनों कमाल लगती थी
कनखियों से देखता था कभी
और गुज़रता था बेहद करीब से कभी
मैं शुक्रगुज़ार हूं दफ्तर के डिज़ायनर का 
कॉरीडोर संकरे बनाए हैं काफी
मैं देर तक खड़ा होता था वॉटर कूलर के पास
कि वहीं से मिलती थी उसकी पूरी झलक
ज़ुल्फ़ की वो एक लट मैं कितनी बार
कान के पीछे रख कर आया
ठीक से मुझे भी याद नहीं
ये सब होता रहा वहीं.
खड़े खड़े वॉटर कूलर के पास
मैं शुक्रगुज़ार हूं दफ़्तर के डिज़ायनर का
कि उसने वॉटर कूलर के लिए वो जगह तय की

कैफ़ेटेरिया की कोने वाली टेबल उसकी फ़ेवरेट थी
जिसके पास ही से लेना होता था खाना
मैं खाना लेते हुए कनखियों से देख लेता था
मैं शुक्रगुज़ार हूं दफ़्तर के डिज़ायनर का
उसने वेन्डर को खाना सर्व करने के लिए वो जगह दी

फिर एक दिन...
मैं सुट्टा ब्रेक के लिए बाहर था
मोबाइल स्क्रीन पर फ्लैश हुआ
हलकट कॉलिंग...
बॉस का फोन था
फोन उठाया, आवाज़ आई--
आई वॉन्ट यू हियर इन 5 मिनट्स
कुछ क्राइसिस थी शायद
अधजली सिगरेट जूते के नीचे शहीद हुई
और मैं ऊपर की ओर भागा
लिफ्ट का दरवाज़ा मेरे फ्लोर पर खुला
जिसके ठीक बग़ल में था
ऑफिस में एंट्री का दरवाज़ा
लिफ्ट खुलते ही मैं बाहर लपका
और वो...
उसे कम्बख्त उसी लिफ्ट में जाना था
हां तो मै कह रहा था..
लिफ्ट खुलते ही जो मैं लपका हूं
बुरी तरह टकरा के गिरा हूं
और गिराया है उसे भी
मैं ऊपर झुका हूं उसके
बॉस का फोन फिर बजा है इस बीच
लेकिन मैं तो ब्लैंक हूं
वो एक लम्हा जैसे वहीं रुक गया है
कि तभी,ऐसी सिचुएशन में, हिंदी फिल्मों की
मेरी सारी जमा पूंजी को कच्चा चबाते हुए
उसीके मुखारविंद से फूटा है
हिंगलिश गालियों का पूरा लॉट
एक भी गाली ऐसी नहीं
जिससे डक करके बच सको
उसी के शब्दों में--
&^^%%$%#%#@$#@@@%^$
U scoundrel! Can't u see properly?
सकपकाया हुआ उठा हूं मैं
और नीची नज़रों से भागा हूं बदहवास

बॉस की तरफ़ बढ़ते हुए
गरिया रहा हूं जी भर के
दफ़्तर के डिज़ायनर को
साला %*%&(^%%$^$^#@%^%@

लिफ्ट को कहीं और नहीं बना सकता था !

Saturday, November 6, 2010

इन सर्दियों में नहीं रहा वो


नसों में बहता ख़ून जम रहा था आहिस्ता आहिस्ता
और थरथराते होठों से जब तब आधे अधूरे
कुछ लफ़्ज़ गिरते थे ज़मीं पर
छनाके के साथ टुकडा टुकड़ा हो जाते थे सब
हाथों ने हिलना बंद कर दिया था
हां, आंखों की पुतलियां ज़रुर
दांएं-बांए कभी चक्कर लगा आती थीं
लेकिन इन इशारों का कोई सिरा,
नहीं पकड़ पाया कोई
कि पकड़ पाता तो
ज़िंदगी का हर क़तरा बर्फ न बन पाता
कि पकड़ पाता तो
रगों में बहता ख़ून बहने लायक रहता
इन सर्दियों में नहीं रहा वो
कनॉट प्लेस के इनर सर्किल में
मोंटे कार्लो शोरुम के ठीक बग़ल में
पड़ा है जिस्म, कोई हलचल नहीं है
लगता है ठंड ने चलाई है दरांती रात भर

Tuesday, September 14, 2010

भोपाल लेक पर...उस रोज़



भोपाल लेक में डूबता सूरज
प्यारा लग रहा था उस रोज़
डूबते हुए लाल गोले के
कुछ छींटे तुम्हारे चेहरे पर आ पड़े थे उस रोज़
उस रोज़ तुमने लेक के पानी में
शायद तीन बार उंगलियों से मेरा नाम लिखा था
बोटिंग नहीं की थी हमने उस रोज़
मैने हाथ पकड़ा था तुम्हारा
तुमने घबरा कर हाथ छुड़ाया था उस रोज़
हंस कर कहा था- मैं कहीं भाग थोड़ी रही हूं
मैं भी हंसा था, कहा- ये हाथ ज़िंदगी भर नहीं छोड़ूंगा

वो कॉर्नर वाले रेस्ट्रां की लेक फेसिंग टेबल पर
हमने कॉफ़ी और सेंडविच का ऑर्डर दिया था
वेटर चौंक पड़ा था उस रोज़
जब तुमने बिल पे किया था
उसे क्या पता था कि हमारे दरमियां
फॉर्मेलिटी जैसा कुछ नहीं
बस प्यार है ढेर सारा
उसे शायद आदत नहीं थी ये देखने की
तुम कितना हंसी थीं, उसके चले जाने के बाद
लाल सूरज डूब चुका था अब तक
बस उसकी लालिमा ज़िंदा थी
तुम्हारे चेहरे पर उस रोज़

रेस्ट्रां से निकलते हुए
उस धुंधलके में तुम्हें दिखा था कैंडीफ्लॉस वाला
सड़क के उस पार खड़ा था वो उस रोज़
तुम्हारी पसंदीदा चीज़ों में से एक़
बस..तुम ज़िद्दी बच्चे की तरह
हाथ छुड़ा कर भागी थीं
और
और
ट्रक...टक्कर...ख़ून..शोर
मैं इस ओर सड़क पर ही
गिर पड़ा था
सन्नाटा पसर गया था मेरे कानों में उस रोज़
मैं माफ़ नहीं कर पाउंगा ख़ुद को कभी
मैंने हमेशा हाथ थामे रखने का वादा किया था
क्यूं तुम्हारा हाथ छोड़ दिया फिर
उस रोज़

Wednesday, August 18, 2010

पीपली में 'मौत की रौनक' ज़ाया नहीं गई


 अगर आपको पता है आपकी तस्वीर अच्छी नहीं आती और कोई बार बार आके तस्वीर खींचने की ज़िद करे तो बड़ा गुस्सा आता है। बस, इस ग़ुस्से की क़िस्म ज़रा अलग होती है। ऐसा गुस्सा जिसका पता है कि इससे शक्ल बदल नहीं जाएगी। ये फ़िल्म देखते हुए ऐसा अनगिनत बार होता है। एक टीवी पत्रकार के लिए पीपली [लाइव] देखना बुरा सपना है, सज़ा है। अच्छा है, थियेटर में अंधेरा रहता है, वर्ना हमारे प्रफ़ेशन की चीरफाड़ के दृश्यों के दौरान उभरते अट्टाहस में मेरा शामिल न होना, आसपास वालों को अजूबा दिखाई देता, सोचते कैसे बिना सेंस ऑफ़ ह्यूमर के लोग आजकल मल्टीप्लेक्स का रुख़ करने लगे हैं...अच्छा है थियेटर में अंधेरा रहता है, वर्ना ऐसी तस्वीरों के दौरान चेहरा पता नहीं कौन से भावों की तस्वीर पेश कर देता और मैं मुंह छुपाया पाया जाता। फिल्म की अंग्रेज़ी पत्रकार, नंदिता कहती है- If you can't handle it, you are in the wrong profession.फिल्म का राकेश, हो सकता है खुद अनुषा रिज़वी हों, रॉन्ग प्रफेशन में हैं, ऐसे ही किसी लम्हे में एहसास हुआ होगा और छोड़ दिया। ख़ैर, उसे छोड़ जो लपका उसे माशाअल्लाह बेहतरीन तरीक़े से कहने की काबिलियत रखती हैं। राकेश भी उसी रॉन्ग प्रफेशन में था...आज़ाद हो गया, प्रफेशन से...और ज़िंदगी से भी। एक टीवी पत्रकार जब पीपली [लाइव] देख रहा हो, तो उसे ज़्यादा हंसी नहीं आती, आ ही नहीं सकती और स्साला सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि हम शायद चाहकर भी इसकी सटीक, बेबाक समीक्षा नहीं कर पाएंगे। क्यूंकि अगर ऐसा किया तो डर है कहीं लोग प्रिंट आउट लेकर फिर से चिढ़ाने न आ धमकें। या फिर मैं कुछ ज़्यादा ही सोच रहा हूं और सच ये हो कि हम ऐसा करना नहीं चाहते, इसलिए महंगाई डायन और बकलोल करती अम्माजी की आड़ में बाक़ी सारी असलियत डकार गए। सच...क्या है, कौन जाने?

लेकिन शुक्र है , ये फिल्म सिर्फ़ मीडिया के बारे में नहीं है। हमने व्यंग्य की ताक़त को हमेशा अनदेखा किया। किताबों में भी और सिनेमा में भी। लेकिन जो बात व्यंग्य अपनी पैनी धार और चुटीले अंदाज़ में कह जाता है, उसकी बराबरी शायद सीधी कहानी कभी न कर पाए। अनुषा ने व्यंग्य की धार से बहुत सारे जाले काटे हैं। ये धार कहीं कहीं इतनी पैनी है कि दिल रोने रोने जैसा होता है। होरी महतो रोज़ाना एक 'ख़ज़ाना' खोदता है, दो जून की रोटी के वास्ते। आज़ादी के 63 साल बाद और इस कृषि प्रधान देश में जन्म लेने के 75 साल (गोदान-1936) बाद भी होरी महतो आज तमाम गांवों में मिट्टी खोद रहा है या यूं कहिए अपनी क़ब्र खुद खोद के वहीं दफ़्न हो रहा है। एक, दूसरा किसान खुदकुशी से लाख रुपये कमाना चाहता है। एक एग्रीकल्चर सेक्रेटरी, नये नवेले आइएएस अफ़सर को 'फ़ाइन दार्जिंलिंग टी' के सहारे आंखें मूंदने की घुट्टी पिला रहा है। एक डीएम, नत्था 'बहादुर' को लाल बहादुर दिला रहा है। पीपली के चुनावों में नत्था की खुदकुशी के ऐलान ने सारे समीकरणों को तोड़-मरोड़ दिया है और अद्भुत तरीक़े से बुने और फिल्माए गए सीन में एक बड़ा भाई छोटे को ख़ुदकुशी के लिए राज़ी कर रहा है। 14-15 बरस के अल्हड़ लड़के (पढ़ें-मीडिया) को ये सब बेहतरीन तमाशा नज़र आता है सो वो चीख़-चीख़कर इस स्टोरी के सारे पहलुओं पर अपनी चौकस नज़र जमाता है शायद ये सोचकर भी कि 'मौत की रौनक' ज़ाया नहीं होनी चाहिए। मौत की रौनक---प्रिंस, कुंजीलाल, सूरज और भी कुछ छितरे हुए नाम इस डायलॉग के बाद दिमाग़ में कौंध जाते हैं। ये तमाम ताम-झाम, ये मेला अगर नाकाबिल हाथों में रहा होता तो ऐसा बिखरता कि आप माथा ठोंकते पर गनीमत है कि अनुषा की मीडिया बैकग्राउंड ने फ़िल्म को साधारण से असाधारण के स्तर तक उठा दिया है।

फिल्म कई मायनों में तय समीकरण तोड़ती है। एक ऐसे सिनेमाई माहौल में जहां रिश्तों और पीआर से कास्टिंग तय होती हो, वहां अनुषा और महमूद ने किरदार चुने और बुने हैं। फिल्म का गांव कोई सेट नहीं है, बल्कि अपनी पूरी धूप-छांव, खेत खलिहान, गली, नुक्कड़, चबूतरे के साथ मौजूद गांव है। फिल्म बिना शक़ हमारे वक़्त के सबसे अहम दस्तावेज़ों में से है।
 और हां, सैफ़ अली ख़ान का सालों पुराना चुंबन अगर कहीं ज़िंदा है विद 2 बाइट्स तो यक़ीन मानिए, आज हमारे वक़्त की सबसे बड़ी स्टोरी होगी। अं, अं, क्या हम किसान आत्महत्या पर बनी किसी फ़िल्म की चर्चा कर रहे थे???

Saturday, July 3, 2010

इन आंखों से कैसे बचेंगे आप?

उन आंखों ने मुझे परेशान कर रखा है
मेरे वजूद को हिला कर रख दिया है

तमाम जगह मेरा पीछा करती हैं वो आंखें
कुछ ख़ास जगहों पर ज़्यादा ही घूरती हैं
मैं जब भी दोस्तों के साथ
ख़ुशी के कुछ लम्हे बांट रहा होता हूं
जाने कहां से धमकती हैं वो आंखें
मैं जब भी पिज़्ज़ा हट या मैकडोनल्ड्स में
अपनी ज़ुबान को ज़ायक़ा दे रहा होता हूं
अजीब तरह से घूरती हैं वो आंखे
मैं भरपेट खाने के बाद फ़्रिज से आइसक्रीम निकालता हूं
तो फ़्रिज का दरवाज़ा बंद कर पलटते ही दिखती हैं वो आंखें
डिस्को थिक की रंग बिरंगी रोशनियों के बीच से कभी
नज़र जाती हैं वो बदरंग आंखें
रातों में किसी ख़ूबसूरत सपने को
अचानक तोड़ देती हैं
पसीने पसीने उठता हूं
कहीं भीगे बदन दौड़ता हूं
बिसलरी की बोतल उठाता ही हूं
गला तर करने को कि
फिर वहीं आंखें
ये छटपटाहट, ये कसमसाहट
कहीं मैं पागल तो नहीं हो रहा

अब कोस रहा हूं मैं वो घड़ी
जब देखी थी मैंने कातर आंखों वाली वो तस्वीर
और पढ़ी थी उसके नीचे की वो ख़बर
मध्य प्रदेश में हर रोज़ कई बच्चे
मर रहे हैं कुपोषण से

Photo Courtesy: Greyfotos

Saturday, June 26, 2010

आइए...ख़ुद को तैयार करें कई और भोपाल त्रासदियों के लिए

साल-2018...जगह-लखनऊ से 58 किलोमीटर दूर हसनपुर में अमेरिकन न्युक्लियर पावर प्लांट। एक तेज़ धमाका। फिर कुछ और धमाके। उसके बाद क्या, कहां, कैसे, क्यूं जैसे कुछ बेमानी से सवाल...अमेरिकन कंपनी पर 500 करोड़ का जुर्माना। और हां, 40 हज़ार इंसानी मौतें और खरबों की संपत्ति मिट्टी के हवाले। लेकिन, इस बारे में बात करने का कोई फ़ायदा नहीं क्यूंकि इस जान-माल के बदले मिल तो गया 500 करोड़। और क्या चाहते हैं। न्यूक्लियर लायबिलिटी बिल में यही तय हुआ था न।
साल-2010...भोपाल गैस त्रासदी के उससे भी ज़्यादा त्रासदी भरे फ़ैसले ने एक शहर के घावों को तो नहीं भरा लेकिन एक बेहद ज़रूरी बहस छेड़ने में ज़रूर मदद की है। ये बहस है न्यूक्लियर लायबलिटी बिल की। लायबलिटी..हिंदी में ज़िम्मेदारी। बिल के मसौदे में ज़िम्मेदारी शब्द की जो बखिया उधेड़ी गई है उससे क्यूं न इसे न्यूक्लियर नॉन लायबलिटी बिल कहा जाए। बिल के मुताबिक़ किसी भी हादसे की सूरत में, फिर चाहे वो कितना भी बड़ा क्यूं न हो...हर्जाने की रक़म 2200 करोड़ से ज़्यादा नहीं होगी यानि क़रीब 500 मिलियन डॉलर, जिसमें से विदेशी कंपनी 500 करोड़ से ज़्यादा नहीं देगी बाक़ी मुआवज़ा भारत सरकार को देना होगा। देश के अंदर क्लेम कमिश्नर बनेंगे, मामला वही देखेंगे, सिविल कोर्ट में मुक़दमा नहीं चलेगा। कोई आपराधिक कार्रवाई नहीं। मंज़ूर हो तो बोलो वर्ना हमें और भी काम है-इस किस्म के तेवर। सरकार मंज़ूरी देना भी चाहती है। राजनीतिक हलकों से विरोध के कोई ख़ास स्वर भी नहीं उठ रहे। ऐसे में मुमकिन है बिल पास भी हो जाए। और, फिर ख़ुदा न करे, कभी एक और भोपाल कहीं हुआ तो वो कई भोपालों के बराबर होगा। रिसते हुए ज़ख़्मों का तब न कोई इलाज होगा न ही नीयत। क्यूंकि ऐसे सभी हालातों के बारे में तथाकथित ज़िम्मेदारियां पहले ही तय की जा चुकी होंगीं।
भोपाल के लिए ज़िम्मेदार यूनियन कार्बाइड को इसी 20 मई को अमेरिकी अदालत के एक फ़ैसले के मुताबिक़ कंपनी के बनाए गए एस्बेस्टस से एक कर्मचारी को कैंसर हो गया और वो 14 मिलियन डॉलर के मुआवज़े का हक़दार है। भोपाल के हर्जाने के तौर पर दिए गए 470 मिलियन डॉलर को अगर अब तक 5 लाख से ज़्यादा लोगों से विभाजित किया जाए तो ये पैसा बैठता है 800 डॉलर। यानि एक अमेरिकन जान की क़ीमत भारतीय की जान से 17000 गुना है।
अब ज़रा हाल ही में गल्फ़ ऑफ़ मैक्सिको में हुए ऑयल स्पिल को देखिए। इस हादसे के लिए ज़िम्मेदार ब्रिटिश पेट्रोलियम यानि बीपी को 2 बिलियन डॉलर तो सिर्फ़ पर्यावरण को हुए नुकसान की भरपाई के लिए देने होंगे। फिर बीपी को पूरी दुनिया मे विलेन के तौर पर पेश करने में ख़ुद राष्ट्रपति बराक ओबामा आगे आ रहे हैं। सैकड़ों मिलियन डॉलर तटीय इलाक़ों में रह रहे लोगों को बांट भी दिए गए हैं। ये सब वहां जहां एक भी इंसानी जान नहीं गई है।
चलते-चलते, वॉरेन एंडरसन की वो बात जो हमें एक देश के तौर पर हमारी औकात बता देती है- "House arrest or no house arrest or bail or no bail, I am free to go home...There is a law of the US...India bye bye,thank you" Anderson on Dec, 7, 84.

Wednesday, June 9, 2010

पाठ संख्या-6 भारत एक क्रिकेट प्रधान देश है !

बचपन की स्कूली पढ़ाई ने यूं तो कई तरह से बेवकूफ़ बनाया लेकिन एक बात जो भुलाए नहीं भूलती वो है हर क्लास में न जाने किन किन किताबों के किन किन पन्नों पर चस्पा- भारत एक कृषि प्रधान देश है बचपन में इम्तेहान की कई कॉपियों पर कई निबंधों की शुरुआत भी इसी तरह की होगी, ऐसी मुझे पूरी उम्मीद है। वो तो बड़े होकर जब विदर्भ के किसानों और पूरे देश में कई स्तरों पर फैली भुखमरी की तस्वीर से रु-ब-रु हुआ तो पता लगा कि भइया अपन को तो बचपन में जमके बेवकूफ़ बनाया गया।
तो अब सवाल ये कि अगर भारत कृषि प्रधान नहीं तो क्या प्रधान है। भारत में तीन धर्मों के बारे में बात की जाती है- राजनीति, बॉलीवुड और क्रिकेट। लेकिन इनमें भी सबसे ज़्यादा अनुयायी क्रिकेट के हैं। जब खेल में खेल और राजनीति दोनों के मज़े मिल रहे हों तो क्यूं न कोई इस धर्म को अपनाए। बचा, बॉलीवुड तो वो तो बेचारा इतना डरता है इस क्रिकेटिया बुख़ार से कि आईपीएल के दौरान नई फ़िल्में तक रिलीज़ नहीं कीं। तो साहब नतीजा ये है कि भारत एक क्रिकेट प्रधान देश है। शरद पवार नामक एक शख़्स भी कभी इसी स्कूली पढ़ाई के सताए हुए होंगे लेकिन जल्द संभल गए और उस पुराने जुमले को भूल कर नए को आत्मसात कर लिया। सो, क्रिकेट में उनका निवेश जारी है। जानते हैं, खेती की फ़सल तो कभी भी धोखा दे सकती है, लेकिन क्रिकेट की फ़सल में बस एक बार बीज डालो बाक़ी न खाद की फ़िक्र न कीटनाशकों की...खेत सोना उगलेगा।
कृषि मंत्री शायद इस बात को बख़ूबी जानते हैं कि देश उन्हें क्रिकेट मंत्री के तौर पर ज़्यादा देखता है। तभी तो वो हर वक़्त क्रिकेट से जुड़ी अपनी ज़िम्मेदारियां पूरी करते नज़र आते रहते हैं। और रहा सवाल आम देशवासियों के लिए प्रधानता का तो वो आप भारतीय टीम के मैच वाले दिन किसी भी नुक्कड़, पान की दुकान, टीवी शोरुम जैसी जगह के बाहर का नज़ारा देख कर समझ सकते हैं। अपने यहां, 50-60 करोड़ कोच तो हैं ही जो हमेशा सटीक तरह से बता सकते हैं कि फलाना बैट्समैन इस या उस ग़लती की वजह से आउट हो गया...उसे फलाने तरीक़े से शॉट खेलना चाहिए था। फिर मैच हारने पर पुतले जलाना...जीतने पर मंगल ग्रह पर तिरंगा फहराने वालों की तरह का भव्य स्वागत...ये सब उसी प्रधानता का सबूत है।
अब जल्द से जल्द कपिल सिब्बल को इस लेख का संज्ञान लेते हुए सभी बोर्ड्स को दिशा निर्देश जारी कर देने चाहिए किताबों में बदलाव के। हर किताब में साफ़ साफ़ लिखा हो- एक ज़माना था जब भारत एक कृषि प्रधान देश हुआ करता था, अब भारत एक क्रिकेट प्रधान देश है। Once upon a time, India used to be a farming nation, now its a Cricket Charming nation.

Sunday, May 9, 2010

मदर्स डे पर टीवी आपको ये नहीं बताएगा !


आज मदर्स डे पर अख़बारों और टीवी के मां पर उड़लते प्यार से इतर कुछ आंकड़े देख लेते हैं। हो सकता है थोड़ा डर लगे...हो सकता है ये भी लगे कि ये तो कहीं दिखाया नहीं गया आज...दरअसल अख़बार और टीवी आपका मूड ख़राब करना नहीं चाहते थे..इसलिए ऐसा नहीं किया !
हमारे यहां एक लाख प्रसवों के दौरान 254 महिलाएं दम तोड़ देती हैं। यानी साल में 65 हज़ार महिलाएं और हरेक आठ मिनट में एक। देश की 56 फ़ीसदी महिलाएं एनीमिया से पीड़ित हैं...तकरीबन 33 फ़ीसदी कुपोषण का शिकार।
और करोड़ों ऐसी जिन्हें पति और बच्चे समान रूप से दुत्कारते हैं।
माफ़ करना...टीवी पर दिन भर मां का लाड़ला, मेरे पास मां है और कैलाश खेर की आवाज़ में मम्मा सुनने के बाद इस 'ख़ास' दिन के ख़त्म होते होते आपका मूड ख़राब कर दिया।

Monday, April 5, 2010

अमां, छोड़िए आईपीएल, शोएब-सानिया ड्रामा देखिए !


अपने वक़्त के सबसे बड़े ब्याह बवाल में आपका स्वागत है। आप जानना चाहते हैं, सबसे ज़्यादा कौन दु:खी है, शोएब-सानिया स्यापे से। और कोई नहीं बल्कि अपने ललित मोदी। अरे, क्यूं न हों। आईपीएल का रंग फीका कर दिया दोनों के रायते ने। अब बेचारे ये भी सोच रहे हैं कि पहले पाकिस्तानी खिलाड़ियों को आईपीएल का हिस्सा बना लेते तो ही अच्छा रहता। इस समय तो हैदराबाद आईपीएल का हिस्सा है और ही शोएब। और दोनों ही ललित मोदी की नींद उड़ाए हुए हैं। हो सकता है, अगर पाकिस्तानी खिलाड़ियों को ख़रीदा जाता तो शोएब भी यहां खेल रहे होते, फिर उन्हें कहां मौक़ा मिलता इतना रायता फैलाने का कि समेटते बने। लेकिन अफ़सोस कि ऐसा हो सका।
आईपीएल के मैचों से ज़्यादा रफ़्तार तो हैदराबादी मसाले में है। शोएब भी आराम से सानिया के घर की बालकनी में ऐसे तफ़रीह करते नज़र रहे हैं जैसे लॉर्ड्स की बालकनी में ट्रॉफ़ी के साथ खड़े हों। हां, ये अलग बात है कि वो सानिया को ट्रॉफ़ी ही तो मानते होंगे जो उन्हें बिना कोई मैच जीते मिल गईं। जैसे लोहा लोहे को काटता है वैसे ही आईपीएल के खेल को दो खिलाड़ी कड़ी टक्कर दे रहे हैं।
अब विकल्प क्या है ललित मोदी के पास ?
मेरे ख़्याल से उन्हें एक काम करना चाहिए। शोएब-सानिया को उन्हें आईपीएल सीज़न 3 का ब्रैंड एंबेसडर बना देना चाहिए। कम से कम टीवी के दर्शक बंटेंगे तो नहीं। वर्ना हैदराबादी तमाशा क्रिकेट के तमाशे पर भारी पड़ता नज़र रहा है।
बस ग़नीमत इतनी है कि अगर तय वक़्त के मुताबिक़ शोएब और सानिया की शादी 15 अप्रैल को हो जाती है तो दर्शक आईपीएल के सेमीफ़ाइनल और फ़ाइनल के लिए तो जुटेंगे। लेकिन...लेकिन अगर ऐसा नहीं हुआ तो ललित मोदी तो गए काम से।
हां, जाते जाते एक बात और। बड़े फ़न्ने ख़ां बनते हुए आईपीएल वालों ने ख़बरिया चैनलों से आईपीएल के एक-एक सेकेंड की फ़ुटेज का हिसाब मांगा था ...अब ज़रा ये असली ड्रामाई फ़ुटेज लेकर दिखाइए। अब आया , ऊंट पहाड़ के नीचे।

Thursday, March 4, 2010

अतिथि! तुम कब जाओगेः व्यंग्य शरद जोशी का, विज़न आश्विनी धीर का

कोई भूमिका बांधना नहीं चाहता, सिर्फ़ एक सूचना है। फ़िल्म अतिथि...शरद जोशी के लिखे व्यंग्य पर आधारित है। वो मिला तो लगा कि आपसे साझा कर लेना चाहिए। तो मज़ा लीजिए उनके पैने व्यंग्य और उसके बाद देखिए फ़िल्म...

---तुम्हारे आने के चौथे दिन, बार-बार यह प्रश्न मेरे मन में उमड़ रहा है, तुम कब जाओगे अतिथि ! तुम कब घर से निकलोगे मेरे मेहमान !

तुम जिस सोफ़े पर टांगें पसारे बैठे हो, उसके ठीक सामने एक कैलेन्डर लगा है जिसकी फड़फड़ाती तारीख़ें मैं तुम्हें रोज़ दिखा कर बदल रहा हूं। यह मेहमाननवाज़ी का चौथा दिन है, मगर तुम्हारे जाने की कोई संभावना नज़र नहीं आती। लाखों मील लंबी यात्रा कर एस्ट्रॉनॉट्स भी चांद पर इतने नहीं रुके जितने तुम रुके। उन्होने भी चांद की इतनी मिट्टी नहीं खोदी जितनी तुम मेरी खोद चुके हो। क्या तुम्हें अपना घर याद नहीं आता? क्या तुम्हें तु्म्हारी मिट्टी नहीं पुकारती?
जिस दिन तुम आए थे, कहीं अंदर ही अंदर मेरा बटुआ कांप उठा था। फिर भी मैं मुस्कुराता हुआ उठा और तु्म्हारे गले मिला। मेरी पत्नी ने तुम्हें सादर नमस्ते की। तुम्हारी शान मे ओ मेहमान, हमने दोपहर के भोजन को लंच में बदला औऱ रात के खाने को डिनर में। हमने तु्म्हारे लिए सलाद कटवाया, रायता बनवाया और मिठाईयां मंगवाईं। इस उम्मीद में कि दूसरे दिन शानदार मेहमाननवाज़ी की छाप लिए तुम रेल के डिब्बे में बैठ जाओगे। मगर, आज चौथा दिन है और तुम यहीं हो। कल रात हमने खिचड़ी बनाई, फिर भी तुम यहीं हो। आज हम उपवास करेंगे और तुम यहीं हो। तुम्हारी उपस्थिति यूं रबर की तरह खिंचेगी, हमने कभी सोचा न था।

सुबह तुम आए और बोले , "लॉन्ड्री को कपड़े देने हैं।" मतलब? मतलब यह कि जब तक कपड़े धुल कर नहीं आएंगे, तुम नहीं जाओगे? यह चोट मार्मिक थी, यह आघात अप्रत्याशित था। मैंने पहली बार जाना कि अतिथि केवल देवता नहीं होता। वह मनुष्य और कई बार राक्षस भी हो सकता है। यह देख मेरी पत्नी की आंखें बड़ी-बड़ी हो गईं। तुम शायद नहीं जानते कि पत्नी की आंखें जब बड़ी-बड़ी होती हैं, मेरा दिल छोटा-छोटा होने लगता है।

कपड़े धुल कर आ गये औऱ तुम यहीं हो। पलंग की चादर दो बार बदली जा चुकी और तुम यहीं हो। अब इस कमरे के आकाश में ठहाकों के रंगीन गुब्बारे नहीं उड़ते। शब्दों का लेन-देन मिट गया। अब करने को को चर्चा नहीं रही। परिवार, बच्चे, नौकरी, राजनीति, रिश्तेदारी, पुराने दोस्त, फ़िल्म, साहित्य। यहां तक कि आंख मार-मार कर हमने पुरानी प्रेमिकाओं का भी ज़िक्र कर लिया। सारे विषय ख़त्म हो गये। तुम्हारे प्रति मेरी प्रेमभावना गाली में बदल रही है। में समझ नहीं पा रहा हूं कि तुम कौन सा फ़ेविकॉल लगा कर मेरे घर में आये हो ?

पत्नी पूछती है, "कब तक रहेंगे ये?" जवाब में मैं कंधे उचका देता हूं। जब वह प्रश्न पूछती है, मैं उत्तर नहीं दे पाता। जब मैं पूछता हूं, वो चुप रह जाती है। तुम्हारा बिस्तर कब गोल होगा अतिथि ?

मैं जानता हूं कि तुम्हें मेरे घर में अच्छा लग रहा है। सबको दूसरों के घर में अच्छा लगता है। यदि लोगों का बस चलता तो वे किसी और के घर में रहते। किसी दूसरे की पत्नी से विवाह करते। मगर घर को सुन्दर और होम को स्वीट होम इसीलिए कहा गया है कि मेहमान अपने घर वापिस लौट जाएं।

मेरी रातों को अपने खर्राटों से गुंजाने के बाद अब चले जाओ मेरे दोस्त ! देखा, शराफ़त की भी एक सीमा होती है और गेट आउट भी एक वाक्य है जो बोला जा सकता है।

कल का सूरज तुम्हारे आगमन का चौथा सूरज होगा। औऱ वह मेरी सहनशीलता की अंतिम सुबह होगी। उसके बाद मैं लड़खड़ा जाऊंगा। यह सच है कि अतिथि होने के नाते तुम देवता हो, मगर मैं भी आख़िर मनुष्य हूं। एक मनुष्य ज़्यादा दिनों देवता के साथ नहीं रह सकता। देवता का काम है कि वह दर्शन दे और लौट जाए। तुम लौट जाओ अतिथि। इसके पूर्व कि मैं अपनी वाली पर उतरूं, तुम लौट जाओ।

उफ़ ! तुम कब जाओगे, अतिथि !

Monday, February 1, 2010

'Apple' of my eyes? Hardly

The stage was set. Technoholics of the world were waiting with bated breath. And then came Steve Jobs on the scene, the man in black, the man who is responsible for making images of young and old, swooning, with a li'l device in hand...all too common. We were waiting for a tablet from Apple, a tablet which was supposed to be a cure for all touch device problems ...a technological leap in its own right. But what Steve Jobs unveiled on Wednesday was a product which had the familiar Apple logo on the back but which could have as easily been engineered in Beijing.
Steve mocked netbooks, called them cheap laptops, indicated that netbooks are nothing but a piece of junk priced low and what he is about to present to the world is actually a revolutionary product. He had no option but to grieve about netbooks simply because his iPad is pitted against them.
Well, the inconvenient truth is, iPad FAILS big time. When you go into the details, you almost feel cheated. Its actually 'iPhone on steroids' as somebody put it, nothing more. No doubt, it has got great resolution at 1024*768 but doesn't offer widescreen. Its like having wings but tied together. It translates into a not so good film watching experience. It can't multitask, that is, if you are thinking of chatting with your pal with great music in the background, forget it..it can't do both the tasks. And while talking of chatting, it will only be text, no video. Dear Steve forgot to put a webcam on the iPad. Hundreds of websites will be useless on iPad, ironically, a device designed for surfing the net, because there is no flash support.
Come on, now you may be an ardent follower of everything Apple, but this is a faux pas. And if you are thinking of plugging your USB devices to it and have all the fun, just forget it, it has ZERO USB ports & no HDMI out. Typing on the iPad will put you and your hands in all the awkward positions imaginable. Talking of Memory, remember what the iPod classic offered- 160GB of memory. And iPad offers you 3 variants 16, 32 & 64GB, now what in the world prompted Apple to pit it against netbooks which come packed with 250GB of memory, 3 USB ports, ethernet, a 92% keyboard, webcam, wi-fi, bluetooth and starting with $250. iPad with wi-fi, 3G & 64GB will burn a hole, the size of a crater in your pocket with $829. At this point, I am reminded of iPhone which had a dream launch and was on everyone's wish-list. Nobody bothered to check that it doesn't have SMS forwarding and many other features. So is the case with iPad, I guess and that is what bothers me. The world will still buy it coz flashing an Apple product is fashionable.

Now the problem is, Why this hurry of coming out with a product which could have been a lot better. And it has become all the more painful because of the Apple association. You can love it, hate it but can't ignore it. Such is the respect it commands. A great touch interface & e book reading capability can't be the face saver of an otherwise disappointing product.
I sincerely hope that Microsoft's tablet- Courier delivers on the promises and presents us with a truly revolutionary product.

Disclosure: The angst in this post, in part, has also been caused by my desire to lay hands on a netbook soon which of course doesn't have a touch screen but has everything that iPad doesn't !

Thursday, January 21, 2010

किताबें बहुत सी पढ़ी होंगी तुमने...

बड़ी गरम बहस छिड़ी है दुनिया भर के अख़बारों के सामने। क्या करें- लोग काग़ज़ी अख़बार से दूर इंटरनेट पर, टीवी पर भाग रहे हैं। इस गरम बहस को ज्वालामुखी के लावे सा बहाने में मदद की है किंडल ने। अमेज़न का ई बुक रीडर- किंडल, जिसने इस दफ़ा क्रिसमस के तोहफ़ों में बाज़ी मारी। जो, यहां तक कि, पारंपरिक किताबों से भी ज़्यादा बिका। और अब आ गया है- स्किफ़। एक ऐसा ई-बुक रीडर, जिसे 11.5 इंच की स्क्रीन के साथ ख़ास तौर पर अख़बार को ध्यान में रखकर बनाया गया है। ऐसे में अख़बारों के सामने भी कोई चारा नहीं, सिवाय काग़ज़ से निकलकर ज़माने के साथ क़दमताल करने को तैयार होने के। अपने यहां, हिंदुस्तान टाइम्स एकमात्र अख़बार है जो इस तरह किंडल पर उपलब्ध है। यानी हर सवेरे 6 बजे एक शुल्क के बदले आपका अख़बार आपके ईबुक रीडर पर डिलीवर हो जाता है- कुछ कुछ, आइडिया के नए विज्ञापन की तरह।
मज़ेदार बात ये है कि जिस तकनीक का डर अख़बारों को खाए जा रहा था, वही तकनीक अब उनके लिए वरदान बन गई है... रेवेन्यू का नया मॉडल, जो काग़ज़ के लिए हो रही पेड़ों की कटाई को भी कम करने में मददगार होगा। यानी अख़बारों को अलविदा कहने का वक़्त अभी नहीं आया और इस तरह शायद कभी आए भी न। तकनीक के जादू का फ़ायदा तो बहुत है...नुकसान है तो बस इतना कि किताबों के बहाने बनने वाले क़िस्से कुछ कम हो जाएंगे।

गुलज़ार ने यही सोच कर लिखा है ये:

ज़ुबान पर ज़ायक़ा आता था जो सफ़हे* पलटने का
अब उँगली ‘क्लिक’ करने से बस इक
झपकी गुज़रती है
बहुत कुछ तह-ब-तह खुलता चला जाता है परदे पर

किताबों से जो ज़ाती राब्ता* था, कट गया है
कभी सीने पर रखकर लेट जाते थे
कभी गोदी में लेते थे
कभी घुटनों को अपने रिहल* की सूरत बनाकर
नीम सजदे* में पढ़ा करते थे, छूते थे जबीं* से
वो सारा इल्म तो मिलता रहेगा बाद में भी
मगर वो जो किताबों में मिला करते थे सूखे फूल
और महके हुए रुक़्के़*
किताबें मँगाने, गिरने उठाने के बहाने रिश्ते बनते थे
उनका क्या होगा
वो शायद अब नही होंगे !!

सफ़हे- पन्ने, राब्ता- संबंध, रिहल- किताब रखने का लकड़ी का प्लेटफ़ॉर्म, नीम सजदा- थोड़ा झुक कर, जबीं- माथा, इल्म- ज्ञान, जानकारी, रुक़्क़े- काग़ज़ के टुकड़े, ख़त

Thursday, January 14, 2010

गुलज़ार करेले की सब्ज़ी हैं, यार !


एक तरफ़ जावेद अख़्तर हैं तो दूसरी ओर गुलज़ार। दोनों ही बेहतरीन गीतकार। एक जो लड़कपन में आप ही के अरमानों को लफ़्ज़ दे रहा था तो दूसरा जिसका लिखा सुनने में तो अच्छा लगता था पर ज़्यादा समझ नहीं आ पाता था। इसलिए लड़कपन में जावेद अख़्तर से ज़्यादा दोस्ती हुई। 'कत्थई आंखों वाली इक लड़की' उस गोरी,चटखोरी पे भारी पड़ती थी जो कटोरी से खिलाती थी। पर हां, साउन्ड्स तो उस समय भी समझ आते थे, मेरा मतलब गाने के संगीत से अलग सिर्फ़ शब्दों के अपने साउन्ड, जैसे- छैंया, छैंया, चप्पा चप्पा चरखा या फिर छैया छप्पा छई। पर उसके बाद के शब्दों की रेलगाड़ी दिमाग़ के बहुत कम स्टेशनों पर दस्तक दे पाती थी।

उस लड़कपन से जवानी की कारी बदरी तक लंबा वक़्त बीत चला है और इस दौरान कब गुलज़ार ज़ेहन मे जावेद अख़्तर की जगह हावी होते गए पता ही नहीं चला। ठीक उस अच्छे बच्चे की तरह जो बचपन में सारी सब्ज़ी-तरकारी खाता है सिवाय करेले की सब्ज़ी के क्यूंकि शायद उसकी ज़ुबान तक तक उस बेहतरीन ज़ायक़े को पकड़ने में नाकाम रहती है। बड़े होने पर वही करेला ख़ूब सुहाता है।
तो गुलज़ार से अपनी दोस्ती भी कुछ इसी क़िस्म की रही। शब्द, कानों से गुज़रने के बाद दिमाग़ के सही ठिकानों पर टकराते गए और होठों पर कभी मुस्कान तो कभी चेहरे की उदासी में बदलते गए। वो गोरे रंग के बदले श्याम रंग दई दे के बार्टर सिस्टम की परतें एकदम खुलने लगीं, नायिका का कुछ सामान क्यूं नायक के पास पड़ा है समझ आने लगा, उसकी हंसी से फसल पका करती थी...कैसे...जानने की ज़रूरत नहीं रह गई, गोरे बदन पे उंगली से नाम अदा लिखने के मायने और पीपल के पेड़ के घने साये में गिलहरी के झूठे मटर खाने की इमेजरी दिल की धड़कन को बेतरह तेज़ कर गई।

और इन दिनों वही गुलज़ार, 'दिल तो बच्चा है जी' के साथ उथल-पुथल मचाए हुए हैं। एक ऐसा गाना जिसमें मुकेश, राजकपूर, 'दसविदानिया' का गिटार, 60 के दशक का ऑरकेस्ट्रा अरेंजमेंट, टैप डांस, राहत की मासूमियत सब गड्ड-मड्ड होने लगते हैं। लेकिन, ख़ुशकिस्मती से ये सब लफ़्ज़ों की उस लड़ी में गुंथे हैं जहां इनकी ख़ुशबू ख़त्म नहीं होती। बल्कि हर बार सुनने में कोई नया ही रंग नुमाया होता है। राहत ने बख़ूबी गाया है इसे।
ज़रा ध्यान से सुनिएगा, गाने में पहली बार जब राहत ने 'बच्चा' बोला है, क्यूंकि बाक़ी के गाने में 'बच्चे' की साउंड, सपाट मिलेगी ऐसी अल्हड़ नहीं।
ये गुलज़ार ही हैं जो दिल को कमीना कहने के बाद भी उसकी मासूमियत बरक़रार रख पाते हैं।

ऐसा नहीं है कि जावेद अख़्तर अच्छे गीतकार नहीं है, लेकिन गुलज़ार...उनकी लीग ही अलग है।

(ये पोस्ट 'दिल तो बच्चा है जी' को रिपीट मोड में प्ले कर लिखी गई है ;-)