Wednesday, October 7, 2009

करवाचौथ पर एक विवाहिता का ख़त यश चोपड़ा के नाम

ये एक ख़त आपसे शेयर कर रहा हूं। शायद पोस्ट नहीं किया गया, आज रास्ते में पड़ा मिल गया था :-)

डियर यश चोपड़ा जी
आप तो जानते ही होंगे कि आज करवा चौथ है। मैं भी कितनी पागल हूं, आपसे से ये सवाल कर रही हूं। वो क्या है कि पहली बार इत्ते बड़े आदमी को चिट्ठी लिख रही हूं न इसलिए, इससे पहले सिर्फ़ अपने प्रेमी को लिखने का तजुर्बा है। अब आपसे क्या छुपाना। आप नहीं जानते कि आपने डीडीएलजे बनाकर देश पर कितना उपकार किया है। हम विवाहिताओं के लिए यही तो एक दिन होता है जब हमें भी लगता है हमारा पति एकाकार होकर शाहरुख़, सलमान या अमिताभ बन गया है। वर्ना रोज़ तो वही किसी एक्स्ट्रा की तरह कोने में पड़ा रहता है। इस दिन लाखों मेंहदी वालों की दुआएं भी आपको लगेंगी क्यूंकि अगर यश राज फ़िल्म्स न होता तो समझिए, इस 'पावन' दिन हज़ारों-लाखों लोग बेरोज़गार ही रहते। हर सड़क, गली, नुक्कड़, कूचे में यूं छोटा सा स्टूल, उसके दोनों तरफ़ निकला भीमकाय शरीर और साथ खड़ा 45 किलो का जीव कहां नज़र आ पाता। वो पार्लर, वो डिज़ायनर चोली-छलनी (बिना साम्य के बावजूद दोनों को एक साथ समेटने के लिए माफ़ी), वो सजना-संवरना, वो इतने सारे ताम-झाम के बदले में 'हीरा है सदा के लिए' की आस...बस ये समझ लीजिए कि मंदी के इस दौर में आप बाज़ार को अनजाने में ही नई दिशा दे रहे हैं। आभार।

वो तो आपका शुक्रिया करने से रहे। चलिए, हमारे ख़बरिया चैनलों की तरफ़ से मैं ही आपको शुक्रिया अदा कर देती हूं। अब आप उनको इतना माल-मसाला जो देते हैं। इस 'पुनीत' अवसर पर बनने वाले कार्यक्रमों में बैकग्राउंड में आप ही की फ़िल्मों का संगीत गूंजा करता है। ऐश्वर्या सरीखियों का करवाचौथ 'कैप्चर' करने के लिए 'जलसा' के सामने वाले फ़्लैट तक किराए पर लिए जाते हैं। हम जैसी विवाहिताएं भी टीवी के सामने बैठकर 'एक्सपर्ट्स' से समझती हैं कि आख़िर कौन से साम-दाम-दंड-भेद से पति को इसी भांति काबू में रखा जा सकता है। तब जाकर इन चैनलों के प्रोड्यूसर टाइप लोग भी गर्व से टीआरपी का तिलक लगा के अपनी-अपनी वालियों के सामने जाके खड़े हो पाते हैं। इसलिए,इनकी तरफ़ से आपका शुक्रिया, करवाचौथ को घर-घर पहुंचाने के लिए, ये आप ही के काम को आगे बढ़ा रहे हैं।

और तो और पर्यावरणविद् तक आपको थैंक्स कह रहे होंगे। जब करोड़ों महिलाए निर्जला व्रत रखेंगी तो करोड़ों लीटर पानी की बचत भी तो होगी। बल्कि वो तो कह रहे हैं कि करवाचौथ जैसे 'एनवायरनमेंट फ़्रैंडली' दिन को महीने में एक बार अनिवार्य कर देना चाहिए।

अच्छा अब लिखना बंद करती हूं। काफ़ी तैयारी करनी है। रात को शाहरुख़... नहीं..मेरा मतलब मेरा वाला, पानी के साथ कुछ चमकने वाली चीज़ भी लाने वाला है।
हां, मेरी तरफ़ से भंसालीजी और रवि चोपड़ाजी को भी तहेदिल से शुक्रिया अदा कीजिएगा। उनका योगदान भी कम नहीं रहा है, इस 'महापर्व' का मेक-अप करने में।

मैं उम्मीद करती हूं कि अगले साल चांद नज़र न आए तो उसकी जगह आपकी और आदित्य जी को तस्वीरों की ही अर्घ्य चढ़ा लिया जाए।

आपकी (अपने पति की भी) एहसानमंद
एक पूर्ण स्वदेशी विवाहिता

Friday, October 2, 2009

हमारी पीढ़ी के लिए शहर 'किरदार' क्यूं नहीं बन पाते ?


मैं जब भी घर-परिवार या बाहर किसी बड़े से उनके शहर के बारे में यादों की चाशनी में पगी बातें सुनता था तो बड़ा अजीब लगता था। ये सोच कर नहीं कि देखो, इन लोगों को बैठे ठाले कुछ काम तो है नहीं बस गपोड़ बने रहते हैं। अजीब दरअस्ल ये सोच कर लगता था कि हमें अपने शहरों से इतना जुड़ाव क्यूं नहीं है। उनके लिए अगर शहर उनकी ज़िंदगी का एक हिस्सा रहे, एक 'किरदार' रहे तो हमारे लिए सिर्फ़ एक नाम क्यूं। आगे बढ़ने से पहले साफ़ कर दूं कि मैं बात कर रहा हूं आज के 22-28 साला नौजवानों की, जिनमें मैं भी शामिल हूं और इसलिए इस अजीब कश्मकश को शिद्दत से महसूस करता हूं। इस पर थोड़ा सोचने के बाद कुछ दिलचस्प बातें सामने आईं हैं। मुमकिन है इन्हीं बातों में 'अपने शहरों' से हमारी दूरियों का फ़लसफ़ा छुपा हो।

शहर ज़िन्दा होते हैं अपने अड्डों से। अड्डे, जिनसे यादें जुड़ी होती हैं, वहां जमने वालों की। अड्डे जो मिलकर शहर को उसकी शक्ल मुहैया कराते हैं, जो उसे एक ऐसे किरदार में बदल देते हैं जिससे दूरियां बहुत तड़पाती हैं। आपने कभी यार-दोस्तों के साथ खाते-पीते इस तरह के जुमले ख़ूब सुने होंगे- 'यार, चाय तो फलां जगह की होती थी, ये भी कोई चाय है' या फिर 'फलाने हलवाई की जलेबियों में गज़ब का स्वाद होता था' या 'कभी शहर जाना होता है तो दोस्तों की टोली यूनिवर्सिटी के पीछे वाले रेस्त्रां में ही मिलती है' या फिर 'याद है, मुहब्बत करने वाले अक्सर उसी पेड़ की छांव में ठंडक ढूंढ़ते थे। '
किसी शहर से लगाव पैदा करने में इस तरह की यादें बहुत अहम हो जाती हैं। अगर इस तरह की यादें नहीं हैं तो यकीन मानिए आपके लिए वो शहर सिर्फ़ एक नाम ही रहेगा या ज़्यादा से ज़्यादा वो जगह जहां आपकी शुरुआती शिक्षा हुई। अगर हमारे बुज़ुर्गों के पास ऐसी यादों की पूरी पोटली है तो हमसे एक पीढ़ी पहले के लोगों के पास मुट्ठी भर यादें तो हैं ही।

लेकिन हमारे पास क्या है?

ऐसा नहीं है कि हमारी पीढ़ी में अड्डेबाज़ी नहीं होती, ठीक-ठाक होती है। बस, अड्डे ऐसे हो गए हैं जो हर शहर में कमोबेश एक से हैं- एक दूसरे की फ़ोटोकॉपी। अब आप बरिस्ता, कैफ़े कॉफ़ी डे, मैकडोनाल्ड्स या पिज़्ज़ा हट जैसे नामों से तो अपने शहर को याद नहीं करेंगे न क्यूंकि जब आप अपने शहर को छोड़ आए हैं तो भी नए शहर में आपको ये सब मिलेंगे तो फिर वो ख़ास तो कहीं छूटा ही नहीं जो शहर को उस शिद्दत से याद दिलाए या कहिए कि दिल में दर्द पैदा कर दे कि वो भी क्या शहर था, वो भी क्या दिन थे। यानी हुआ ये कि आपके ट्रांसफ़र होते ही ये सारे अड्डे अपने पूरे रंग-ढंग के साथ ट्रांसफ़र हो गए। और फिर फ़ेसबुक, ऑरकुट और ट्विटर जैसे वर्चुअल अड्डे तो आपको शहर से लगाव पैदा करवाने से रहे।

तो बात यहां पर आकर ख़त्म हुई ठहरी कि जो हुआ सो हुआ, अगर अब अपने शहर जाना हो, तो उसे बिल्कुल नए नज़रिए से देखने की कोशिश करेंगे। जैसे टूरिस्ट देखता है- हर चीज़ को ख़ासी बारीकी और जिज्ञासा से। तब हमें ज़रूर कुछ ऐसी चीज़ें मिल जाएंगी जो हमें भी अपने शहर पर नाज़ करने, उसे याद करने का मौका देंगीं।

इस विश्लेषण में मुझे पूरी उम्मीद है कि कई जगह आप मुझसे इत्तेफ़ाक नहीं रखते होंगे और मुझे इस बात की भी पूरी उम्मीद है कि आप अपनी टिप्पणी के ज़रिए अपनी बात भी रखेंगे। हो सकता है आप इसी पीढ़ी के हों और अपने शहर को शिद्दत से याद करते हों। हम आसानी से इस विश्लेषण में जोड़-घटाव कर सकते हैं...लेकिन आपकी मदद से ही।