Thursday, October 25, 2007

ख़बर है !


अचानक कुछ शोर-गुल सुनकर
खिड़की खोल कर झांका बाहर
दृश्य देख चौंका ठिठका
कुछ घर आग के हवाले थे
अंधेरे घरों में उजाले थे
जो अंधेरे से भी काले थे

ये वो वक़्त था
जब आदमी आदमी से दूर था
माने दूरियों का दौर था
उठकर टीवी ऑन किया
कैमरा जो दिखा रहा था
वो देखने लायक नहीं था

पुलिस और प्रशासन
अक्सर मिलकर प्रयोग होने वाले शब्द
और साथ काम करने वाले लोग
पूरी तरह मुस्तैद थे
ऐसी ख़बर थी
शायद सच

दिन किसी तरह गुज़रा

अगले दिन का अख़बार
मेरे ख़याल से ख़ूब बिका होगा
क्यूंकि
मुखपृष्ठ पर थीं दो तस्वीरें
एक ज़िंदा जलाए गए युवक की धुंधली तस्वीर
और गिरफ़्तार लोगों की क्लोज़ अप तस्वीर

तस्वीरों के ऊपर ही ख़बर चस्पा थी
शहर में फिर दंगा भड़का
दो की मौत
शायद बिल्कुल ठीक
मज़हब और इंसानियत की मौत !

Monday, October 22, 2007

लीला ने लीला


रामलीला - क्या वाकई ? राम का तो पता नहीं लेकिन ये बाज़ार की लीला ज़रूर है। और कोई छोटी मोटी नहीं बल्कि लाखों-करोड़ों की लीला। इसमें आयोजन कमेटियों ने क्या-क्या लीला इसका हिसाब-किताब रखना भी आसान नहीं। राम के नाम पर चंदा बटोरने वालों के पास इस बार तो बहाना भी अच्छा था - भई इतना बड़ा रामसेतु लोगों के दिमाग़ में पुनर्स्थापित करने में पइसा तो खरच होगा न। अहो भाग्य मेरे जो हर रात (सवेरे दर्शन करना मेरे बूते में नहीं) दूर से ही सही राम के दर्शन तो हुए साथ ही दर्शन हुए कई ऐसी चीज़ों के जो न होते तो कुछ अधूरा सा रहता। दर्शन हुए बाहें फैलाए बुलाते बाज़ार के, दर्शन हुए लीला के बीच में पाताल से उतरे नेताओं के स्व- आगत के और दर्शन हुए एसी कमरों में बैठे आयोजकों और 'पास' से दूर रहते आम आदमी के। लेकिन वक़्त का पहिया घूम चुका है या कहें बाज़ार ने यहां भी दस्तक दे दी है। ये रामलीला का 2007 संस्करण है जिसमें आपको चाट-पकौड़ी भी मिलेगी और अत्याधुनिक झूले भी। दुकानें अपनी पूरी भव्यता लिए मौजूद हैं जहां चीज़ें कई गुना महंगी हैं। अगर प्यास लगी है तो गला तर करने के लिए जेब से पच्चीस रुपये ख़र्च करने होंगे। अगर मेरी याद्दाश्त मुझे धोखा नहीं दे रही तो ज़िंदगी में जिस एकमात्र रामलीला में बड़ों की उंगली पकड़ कर मैं गया वहां स्वयंसेवकों का पानी पिलाना आज भी याद है। लेकिन भइया यहां तो पानी भी एक ही ब्रांड का मिलेगा अगर गरज पड़ी है तो पियो वरना फूटो ?अगर आप सोच रहे हैं क्यूं तो वो इसलिए कि पानी का भी ठेका उठता है। ये धर्म की ठेकेदारी है, ये राम नाम की ठेकेदारी है, ये बाज़ार की ज़रूरतों की ठेकेदारी है - यहां हर चीज़ का ठेका उठता है।
यूं तो रामायण में राम रावण पर भारी पड़ते हैं लेकिन रामलीला का बाज़ार काफ़ी हद तक रावण ने अपने मज़बूत कंधों और दस सिरों पर उठा रखा है। हर साल ‘ नई ऊंचाईयां ’ हासिल कर रहे रावण के बारे में समझ नहीं आता कि बुराईयां बढ़ रही हैं इसलिए क़द बढ़ रहा है या बढ़ता क़द अपने साथ बुराईयां बढ़ा रहा है। अजब पहेली है।
क्रांतिवीर वाले नाना पाटेकर के डायलॉग का रिपीट टेलीकास्ट लगे तो लगे लेकिन मैने तीसरी में बिल्कुल पढ़ा था कि रामायण मतलब बुराई पर अच्छाई की जीत। उस वक़्त शायद नया-नया पाठ पढ़ कर गली में बेचने वाले से नए तीर-कमान... नहीं...हम शायद धनुष-बाण कहते थे, ख़रीदे गए थे और हर चीज़ पर कभी न लगने वाले निशाने साधे गए थे। अच्छाई और बुराई समझ न आने वाली चीज़ें हुआ करती थीं – कोई बात नहीं, वो बचपन था। लेकिन अफ़सोस कि हममें में से ज़्यादातर लोगों के लिए ये अभी भी वही चीज़ें हैं – समझ न आने वाली।

Wednesday, October 17, 2007

हमऊ ब्लॉगिया गये !




लोग पगलाते हैं लेकिन हम ब्लॉगिया गये हैं। और मज़ेदार बात कि ये पागलपन ख़ुद का मांगा हुआ है। सच्ची। कितने वक़्त से कितना कुछ कहने की इच्छा थी। अब शायद वो सब पूरा होगा। ख़्वाबों को पंख मिल जाएं इससे बेहतर भला क्या हो सकता है। लेकिन भैया (बहनें लिखना ख़तरे से ख़ाली नहीं) ये मैं क़तई नहीं चाहूंगा कि इस पर सिर्फ़ मैं ही बक बक करता रहूं और आप सर्फ़िंग की सड़क पर रैड लाइट की तरह रुकें और आगे बढ़ जाएं। अच्छा होगा कि ये चिट्ठा रैड लाइट न होकर एक पुल बने - लोगों का, ख़्वाहिशों का और अनकही बातों का। विचारों की आंधी हर तरफ़ से बहे। आप भी कहें मैं भी कहूं। हां, मैं टीवी पत्रकार हूं तो ज़ाहिर है इस बहुरंगी दुनिया की बातें ज़्यादा करुंगा लेकिन वादा ये कि बात हर तरफ़ की होगी। 'इसी बहाने' आप सब से बातें होंगी और अभिव्यक्ति के इस अद्भुत माध्यम की ताक़त के साथ जीने का मौक़ा मिलेगा। उम्मीद है कि साथ जो शुरु हुआ है बना रहेगा।