Monday, October 22, 2007

लीला ने लीला


रामलीला - क्या वाकई ? राम का तो पता नहीं लेकिन ये बाज़ार की लीला ज़रूर है। और कोई छोटी मोटी नहीं बल्कि लाखों-करोड़ों की लीला। इसमें आयोजन कमेटियों ने क्या-क्या लीला इसका हिसाब-किताब रखना भी आसान नहीं। राम के नाम पर चंदा बटोरने वालों के पास इस बार तो बहाना भी अच्छा था - भई इतना बड़ा रामसेतु लोगों के दिमाग़ में पुनर्स्थापित करने में पइसा तो खरच होगा न। अहो भाग्य मेरे जो हर रात (सवेरे दर्शन करना मेरे बूते में नहीं) दूर से ही सही राम के दर्शन तो हुए साथ ही दर्शन हुए कई ऐसी चीज़ों के जो न होते तो कुछ अधूरा सा रहता। दर्शन हुए बाहें फैलाए बुलाते बाज़ार के, दर्शन हुए लीला के बीच में पाताल से उतरे नेताओं के स्व- आगत के और दर्शन हुए एसी कमरों में बैठे आयोजकों और 'पास' से दूर रहते आम आदमी के। लेकिन वक़्त का पहिया घूम चुका है या कहें बाज़ार ने यहां भी दस्तक दे दी है। ये रामलीला का 2007 संस्करण है जिसमें आपको चाट-पकौड़ी भी मिलेगी और अत्याधुनिक झूले भी। दुकानें अपनी पूरी भव्यता लिए मौजूद हैं जहां चीज़ें कई गुना महंगी हैं। अगर प्यास लगी है तो गला तर करने के लिए जेब से पच्चीस रुपये ख़र्च करने होंगे। अगर मेरी याद्दाश्त मुझे धोखा नहीं दे रही तो ज़िंदगी में जिस एकमात्र रामलीला में बड़ों की उंगली पकड़ कर मैं गया वहां स्वयंसेवकों का पानी पिलाना आज भी याद है। लेकिन भइया यहां तो पानी भी एक ही ब्रांड का मिलेगा अगर गरज पड़ी है तो पियो वरना फूटो ?अगर आप सोच रहे हैं क्यूं तो वो इसलिए कि पानी का भी ठेका उठता है। ये धर्म की ठेकेदारी है, ये राम नाम की ठेकेदारी है, ये बाज़ार की ज़रूरतों की ठेकेदारी है - यहां हर चीज़ का ठेका उठता है।
यूं तो रामायण में राम रावण पर भारी पड़ते हैं लेकिन रामलीला का बाज़ार काफ़ी हद तक रावण ने अपने मज़बूत कंधों और दस सिरों पर उठा रखा है। हर साल ‘ नई ऊंचाईयां ’ हासिल कर रहे रावण के बारे में समझ नहीं आता कि बुराईयां बढ़ रही हैं इसलिए क़द बढ़ रहा है या बढ़ता क़द अपने साथ बुराईयां बढ़ा रहा है। अजब पहेली है।
क्रांतिवीर वाले नाना पाटेकर के डायलॉग का रिपीट टेलीकास्ट लगे तो लगे लेकिन मैने तीसरी में बिल्कुल पढ़ा था कि रामायण मतलब बुराई पर अच्छाई की जीत। उस वक़्त शायद नया-नया पाठ पढ़ कर गली में बेचने वाले से नए तीर-कमान... नहीं...हम शायद धनुष-बाण कहते थे, ख़रीदे गए थे और हर चीज़ पर कभी न लगने वाले निशाने साधे गए थे। अच्छाई और बुराई समझ न आने वाली चीज़ें हुआ करती थीं – कोई बात नहीं, वो बचपन था। लेकिन अफ़सोस कि हममें में से ज़्यादातर लोगों के लिए ये अभी भी वही चीज़ें हैं – समझ न आने वाली।

5 comments:

  1. समाज की दरारों (मेरा मतलब समाज की कमियों से है)को व्यंग्य की तीखे बाणों में डूबोकर कहा जाए तो उसका मज़ा ही कुछ और है।रामलीला की लीला पर आपका ये अन्दाज़ पसन्द आया।वैसे काबिले तारीफ है ...आप बिज़ी शेड्यूल से वक्त निकाल कर लिख पाते हैं।लिखते रहो भाई!!!

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  2. रामलीला की लीला पर विचार रखने की कोशिश तो क़ाबिले तारीफ़ है,लेकिन मेरी समझ में नहीं आया कि लेखक कहना क्या क्या चाहता है।बाज़ारवाद पर चोट या लीला के ठेकेदारों पर व्यंग।अच्छा होता अपनी बात स्पष्ट तौर पर कही जाती।

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  3. prabuddha ke saath saath santosh ke andaz bhi lajavab hain....waise article se mujhe khas shikayat nahi hai....lekin dukh is baat ka hai ki article padh kar saira aapko bhai kehna nahi bhuli....agla article zara is andaz se likhiyega ki koi aur ladki bhai na bana le...............per sach kahoon tumhaare vicharo aur lekhan shakti ko dekhte hue isse behtar ka intazaar rahega

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  4. 'मेरी समझ में नहीं आया कि लेखक कहना क्या क्या चाहता है।बाज़ारवाद पर चोट या लीला के ठेकेदारों पर व्यंग।'
    संतोष, बाज़ारवाद और ठेकेदारी को अलग रखके नहीं देखा जा सकता। लीला की गड़बड़ियों से यहां बाज़ारवाद जन्मा और बाज़ार के असर से लीला में गड़बड़ियां शुरु हुईं - ये एक कुचक्र है।

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  5. "देखा चंदा को बदली से निकलते,
    आज तेरा चेहरा याद आया...... ।

    देखा पंतगों को शमां पर झूमते,

    मिलन वो तेरा मेरा याद आया...... ।



    मौसम था जो खुश, बहार थी चंचल,
    कली को झूमते देखा, तेरा चेहरा याद आया...... ।
    यूँ दर्द सह-सहकर मैं आदी हो गया ग़मों का,

    मगर जाने क्यों मुझे तेरा दर्द याद आया.....

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