बड़ी गरम बहस छिड़ी है दुनिया भर के अख़बारों के सामने। क्या करें- लोग काग़ज़ी अख़बार से दूर इंटरनेट पर, टीवी पर भाग रहे हैं। इस गरम बहस को ज्वालामुखी के लावे सा बहाने में मदद की है किंडल ने। अमेज़न का ई बुक रीडर- किंडल, जिसने इस दफ़ा क्रिसमस के तोहफ़ों में बाज़ी मारी। जो, यहां तक कि, पारंपरिक किताबों से भी ज़्यादा बिका। और अब आ गया है- स्किफ़। एक ऐसा ई-बुक रीडर, जिसे 11.5 इंच की स्क्रीन के साथ ख़ास तौर पर अख़बार को ध्यान में रखकर बनाया गया है। ऐसे में अख़बारों के सामने भी कोई चारा नहीं, सिवाय काग़ज़ से निकलकर ज़माने के साथ क़दमताल करने को तैयार होने के। अपने यहां, हिंदुस्तान टाइम्स एकमात्र अख़बार है जो इस तरह किंडल पर उपलब्ध है। यानी हर सवेरे 6 बजे एक शुल्क के बदले आपका अख़बार आपके ईबुक रीडर पर डिलीवर हो जाता है- कुछ कुछ, आइडिया के नए विज्ञापन की तरह। 
मज़ेदार बात ये है कि जिस तकनीक का डर अख़बारों को खाए जा रहा था, वही तकनीक अब उनके लिए वरदान बन गई है... रेवेन्यू का नया मॉडल, जो काग़ज़ के लिए हो रही पेड़ों की कटाई को भी कम करने में मददगार होगा। यानी अख़बारों को अलविदा कहने का वक़्त अभी नहीं आया और इस तरह शायद कभी आए भी न। तकनीक के जादू का फ़ायदा तो बहुत है...नुकसान है तो बस इतना कि किताबों के बहाने बनने वाले क़िस्से कुछ कम हो जाएंगे।
गुलज़ार ने यही सोच कर लिखा है ये:
ज़ुबान पर ज़ायक़ा आता था जो सफ़हे* पलटने का
अब उँगली ‘क्लिक’ करने से बस इक
झपकी गुज़रती है
बहुत कुछ तह-ब-तह खुलता चला जाता है परदे पर
किताबों से जो ज़ाती राब्ता* था, कट गया है
कभी सीने पर रखकर लेट जाते थे
कभी गोदी में लेते थे
कभी घुटनों को अपने रिहल* की सूरत बनाकर
नीम सजदे* में पढ़ा करते थे, छूते थे जबीं* से
वो सारा इल्म तो मिलता रहेगा बाद में भी
मगर वो जो किताबों में मिला करते थे सूखे फूल
और महके हुए रुक़्के़*
किताबें मँगाने, गिरने उठाने के बहाने रिश्ते बनते थे
उनका क्या होगा
वो शायद अब नही होंगे !!
सफ़हे- पन्ने, राब्ता- संबंध, रिहल- किताब रखने का लकड़ी का प्लेटफ़ॉर्म, नीम सजदा- थोड़ा झुक कर, जबीं- माथा, इल्म- ज्ञान, जानकारी, रुक़्क़े- काग़ज़ के टुकड़े, ख़त
