Monday, April 9, 2012

है जवाब किसी के पास?


पान सिंह अपने अफ़सर से कहता है-- चौथी फ़ेल हूं, आदमी पढ़ा है। ये संवाद लिखा पान सिंह के लिए गया लेकिन संवाद का दूसरा हिस्सा इरफ़ान के लिए सटीक है...आदमी पढ़ा है। सच तो है। बिना आदमी पढ़े, इंसानी जज़्बात के तमाम रंग पान सिंह तोमर के कैनवस पर छिटकना मुमकिन नहीं था। एक ऐसे देश में जहां बायोपिक के नाम पर दूरदर्शन डॉक्यमेंट्री बनती हैं, वहां ये फ़िल्म विषय और उसकी प्रस्तुति का नायाब नमूना है। कलाकारों के चयन से लेकर लोकेशन तक, संवाद से लेकर स्क्रीनप्ले तक सब कुछ आला दर्जे का‍‌।फिल्म की रफ़्तार और थ्रिल पारंपरिक हिंदी फिल्म के खांचे से सट कर गुज़रते हैं, पर उसमें अपने को फंसाने की कोशिश नहीं करते। यही निर्देशक की कामयाबी भी है। क्योंकि, सिनेमा अगर जादू न चलाए तो बेकार है। उस अंधेरे में पान सिंह के साथ आप अपने अंदर के बाग़ी को तलाशने लगेंगे, उस किरदार को उभारने में इतना तो इरफ़ान ज़रूर कर गए हैं। फिर वो बॉस को जवाब देने का माद्दा हो, अपनी रोज़मर्रा की नौकरी से बग़ावत करना या फिर आपके किसी जायज़ काम में अड़ंगा डालने वाले व्यक्ति का गिरेबान पकड़कर उसे सबक सिखाना।


और फिर इन बग़ावती तेवरों को वजह बख़्शने वाला संवाद भी तो है जो कहता है कि जो किया वो ख़ुद नहीं किया बल्कि हालात ने करवाया। फिर उसका जवाब मांगा जाता है, दो बार---"जा बात कौ जवाब कौन देगौ" । एक बार पान सिंह के हाथों क़त्ल हुए आततायी भाई से और दूसरी बार थियेटर में बैठे दर्शकों से।

... और जवाब, वो तो न भाई के पास है और न ही दर्शकों के।

इंटरवल से पहले के पान सिंह से मोहब्बत सी होने लगती है। अपना सा लगता है वो। बेलौस अंदाज़, बेसाख़्ता सचबयानी, और वो चीते सी रफ़्तार। वो आदमी जो फौज में स्पोर्ट्स में भर्ती हुआ इसलिए कि वहां कम से कम खाने पर रोकटोक तो न होगी। लेकिन, जिसने अपनी मेहनत और रफ़्तार से देश का सिर ऊंचा किया। जब माटी और मां की याद ज़्यादा सताने लगी तो फ़ौज छोड़ दी, गांव का रूख़ किया। गांव में रफ़्तार के पांव में बग़ावत का लोहा भरने के सारे हालात पहले से तैयार थे। भाइयों ने सताया तो पुलिस और प्रशासन ने भी नहीं बख़्शा। तमाम मेडल और तस्वीरें बेमानी हो गए। बेटे को लथपथ कर घर में डाला गया। पान सिंह के हिस्से में आया तो धधकता हुआ गुस्सा और कुछ न कर पाने की छटपटाहट।


बस यहीं से जन्म हुआ बग़ावत का।

पान सिंह उन चुनिंदा फिल्मों की जमात में शामिल हो गई है जहां हर दूसरे मिनट आपको बेहतरीन सिनेमाई दृश्य और चुटीले संवादों का मेल मिलेगा। एक बानगी देखिए:

पान सिंह चंबल के बीहड़ों में अपने गैंग के साथ बैठा है। तभी एक साथी रेडियो ऑन करता है। रेडियो पर कमेंट्री--और कभी अंतर्राष्ट्रीय स्टीपलचेज़ धावक रहे पान सिंह ने पुलिस की नाक में दम कर रखा है(कुछ ऐसा ही) और पान सिंह का उस साथी को गरियाना...अबे बंद कर जाए...जब देश के लिए दौड़े, तब कऊ ने न पूछा और अब बागी है गए हैं तो हर तरफ़ पान सिंह।

या जब पान सिंह अपने फौजी बेटे से मिलने जाता है। बेटा, पिता के पैर छूना चाहता है लेकिन पिता बाक़ी लोगों के सामने अपनी पहचान ज़ाहिर करना नहीं। दोनों के बीच जो संवाद होता है वो आम होकर भी कितना ख़ास है, ये महज़ देखने नहीं महसूस करने की चीज़ है।

लेकिन एक सीन जिसकी एडिटिंग को देखकर लगा कि अरे एडिटर, सिर्फ़ दस फ्रेम और छोड़ देता तो उसका क्या जाता वो है जब पान सिंह फौज से विदा लेने के बाद अपने सीनियर अफ़सर से फोन पर बात कर रहा है। अफ़सर उसके लिए आइसक्रीम भिजवाता है। पान सिंह, फोन पकड़े पकड़े कहता है---ये हमारौ सबसे बड़ौ इनाम है। ये कहते हुए पान सिंह के चेहरे पर जो भाव आता है उसे एबरप्ट तरीक़े से काट कर दूसरे सीन पर जाने की जल्दबाज़ी समझ से परे है।


पान सिंह जिस दौर के सिस्टम से, जिस जगह पर लड़ रहा है वहां दुनाली बंदूक़ों से ख़ून बहना और बहाना मामूली बाते हैं। एक ऐसी जगह जहां कलक्टर भी कहने को मजबूर होता है कि ये तुम्हारा झगड़ा है, तुम्ही निपटो। जहां पुलिस स्टीपल चेज़ के मायनों में ह्यूमर तलाश रही है। ऐसे में बग़ावत को आप जस्टिफ़ाई नहीं करेंगे तो और क्या करेंगे।

पान सिंह का एनकाउंटर करने वाले पुलिस अधिकारी को उसका सीनियर कहता है-- यार, इस पान सिंह ने देश के लिए कई मेडल जीते हैं। इस पर तपाक से इंसपेक्टर का जवाब आता है--सर, पान सिंह सिर्फ़ एक अपराधी है।

तब आपको पान सिंह का ये संवाद याद आता है---

हम तो एथलीट हते, धावक। इंटरनेसनल। अरे हमसे ऐसी का गलती है गई कि तैने हमसे हमायो खेल को मैदान छीन लओ। और तुम लोगन ने हमाये हाथ में जे पकड़ा दई। अब हम भग रए ऐं चंबल के बीहड़ में। जा बात कौ जवाब कौन देगौ, जा बात कौ जवाब कौन देगौ।


और जैसा मैंने पहले कहा--

जवाब, वो तो न भाई के पास है और न ही आपके।

और फिर से...जैसा मैने पहले कहा...

इंटरवल से पहले के पान सिंह से मोहब्बत सी होने लगती है। इंटरवल के बाद के पान सिंह से मिलने के बाद व्यवस्था से हताशा हमारे मन में कहीं गहरे तक पैवस्त होती है और फिर खुद बाग़ी न बन पाने को जस्टिफाई करने की वजहें ये बावला मन एक एक कर खुद को ही सुनाता है।

Saturday, December 17, 2011

कच्ची शराब से मरे तो क्या मरे



45 मौत...फिर 73
फिर 93, 125, 143
और आख़िर में
170 पार
मक़तूलों* में शामिल थे
रिक्शेवाले, रेहड़ी वाले
और मुमकिन है कुछ भिखारी भी
मक़तूल..हां मक़तूल ही तो थे
जिन्हें बड़ी बेरहमी से
क़त्ल किया गया था
कच्ची शराब की हर बूंद
शिराओं में ज़हर घोल गई

170 पार !
रूखे सूखे आंकड़ों को
नंगे भूखे लोगों को
सियासत नहीं आती
बस छाती पीट कर
ग़म का इज़हार आता है
जहां सटल्टी नहीं होती
बस ग़म और गुस्से का
ज्वार होता है

इन चितकबरे बदसूरत लोगों को
टीवी का पर्दा मिलता है
कुछ मिनट ही
दिल्ली से 1500 किलोमीटर दूर
ख़बरों को जुटाना
महंगा पड़ता है काफ़ी
पर ये नासमझ कंबख़्त
मरने से पहले कहां सोचते हैं ये सब
तो अब भुगतो
कच्ची शराब की पक्की मौत

अरे नामुरादों
तुम्हें मौत भी आई तो कैसी
दोहरे शतक के नज़दीक हो
और दो ही मिनट की ख़बर
तुम्हें बतौर श्रद्धांजलि पेश की जाएगी
क्योंकि काउंटडाउन शुरु हो चुका है
भारत रत्न से एक क़दम दूर वाले
भगवान के महाशतक का
उधर रुपया डॉलर के मुकाबले
कितना कमज़ोर हो गया है जानते हो
कैसे जानोगे
होगा तो जानोगे न...
चिदंबरम पर वार तीखे हो चले हैं
पता है पता है, नहीं पता होगा तुम्हें
और वीना मलिक लापता हैं
मल्लिका -ए-टीवी वीना मलिक

अब चूंकि ये तुम्हारी
आख़िरी मौत तो है नहीं
तुम्हें कई बार और भी मरना है
तो अगली बार
इतनी बड़ी बड़ी ख़बरों से
टकराने की कोशिश मत करना
मौत से लिपटना ज़रूर
लेकिन हो सके तो
अदद वक़्त और जगह तय करके

और हां कच्ची शराब से तो बिल्कुल नहीं
बड़ी डाउनमार्केट है स्साली

मक़तूल--जिसको क़त्ल किया गया हो

Sunday, November 27, 2011

चलो आज जिया जाए


दूर तक खुले मैदान में
फेफड़ों में ताज़ा हवा लेके
हांफ कर गिरने तक
दौड़ का लुत्फ़ लिया जाए
चलो आज जिया जाए

कई घंटे की प्यास के बाद
मिनरल वॉटर की सारी बोतलें भूलकर
किसी खेत में ट्यूबवेल से
ओक भर पानी पिया जाए
चलो आज जिया जाए

अपार्टमेंट के 26वें फ्लोर की बालकनी से
काग़ज़ के दो टुकड़े गिराकर
कौन सा पहुंचेगा पहले
इस शर्त का मज़ा लिया जाए
चलो आज जिया जाए

मोबाइल, इंटरनेट से दूर
अख़बार, टीवी से दूर
जज़्बातों की बस्ती में
रिश्तों को बारीकी से सिया जाए
चलो आज जिया जाए


किसी अनजाने शहर में
बिल्कुल अकेले, तन्हा
अनजान निगाहों के बीच
कोई नया रिश्ता कायम किया जाए
चलो आज जिया जाए

अपने बच्चे के प्लेस्कूल में
किसी दिन कुछ देर ठहरकर
कुदरत की मासूमियत को
फिर से पिया जाए
चलो आज जिया जाए

छोटी सी है ज़िंदगी
छोटी छोटी हैं ख़ुशियां
छोटे हम, छोटे सपने
ज़िंदगी को रिटर्न गिफ़्ट दिया जाए
चलो आज जिया जाए
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