Friday, October 10, 2008

सेंसेक्स के उस्ताद, सेंसेक्स के जमूरे


साहेबान, क़दरदान, मेहरबान, ...आइए, बस चले आइए। खेला इतना मस्त दिखाएंगे कि मज़ा आ जाएगा। बोल जमूरे तैयार है।
-जी उस्ताद बिल्कुल तैयार हूं।
जमूरे, कहां का खेला दिखाने वाले हैं हम।
शेयर बाज़ार का, उस्ताद।
शाबाश जमूरे...बटोर ले लोगों से पैसा, एक भी बंदा छूटने न पाए। अरे साहेबान, डरिए मत जमूरे को बेहिचक पैसा सौंप दीजिए...हिन्दुस्तान तरक़्क़ी कर रहा है, आपका पैसा दुगुना, तिगुना या फिर चौगुना भी हो सकता है। अरे ओ नीली कमीज़ वाले साहब। काहे घबराते हैं। देखते नहीं, सेंसेक्स कैसे कुलाचें भर रहा है। समझ लो कि सांड पागल होकर बेतहाशा आगे भाग रहा है। हां जमूरे बटोरता रह, बढ़ता रह...बटोरता रह, बढ़ता रह। ये हिन्दुस्तान का मस्त लोग है...खुलकर पैसा देगा। जमूरे, जेबें उलटवा के देख लेना, कुछ छूटने न पाए। बदले में इन्हें मालामाल कर देंगे।

जमूरा(उस्ताद के कान में)- कुछ लोग बिना पैसा दिए भागने की फ़िराक में हैं। क्या करुं?
उस्ताद- अरे लगता है पहले इन्हें कुछ कमाल करके दिखाना होगा।जमूरे, काली शर्ट वाले साहब ने बाज़ार में कितने पैसे लगाए है?

समझ गया उस्ताद...
-देखिए, काली शर्ट वाले साहब के दस हज़ार बन गये पूरे पच्चीस हज़ार। कुछ ही वक़्त में कैसा ग़ज़ब हुआ है। तो आगे आइए, डरने का नहीं, हिचकिचाने का नहीं। दिल खोलकर पैसा लगाने का...पैसा बनाने का। पैसा लगाने का...पैसा बनाने का।
कुछ ही समय बाद उस्ताद के पास लाखों रुपये जमा हो गए और उतने ही समय बाद सेंसेक्स की कुलांचें, कुल मिलाकर आंच बन गईं। सांड को अकेले में देखकर भालुओं के झुंड ने उस पर हमला कर दिया। दलाल स्ट्रीट, हलाल स्ट्रीट बन गई। नतीजतन उस्ताद के पास जमा लाखों की रकम सिक्कों की खनक के बराबर रह गई। लेकिन उस्ताद कोई झूठमूठ के लिए उस्ताद थोड़े ही था। वो तो सचमुच उस्ताद था।
-जमूरे, अब इन लोगों को बता दो कि क्या करना है।
-जी उस्ताद। तो साहेबान, पैसा देने के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया। हमको मालूम कि आपको पता चल गया है कि सेंसेक्स का रफ़्तार पलटी मारने का। लेकिन आपको घबराने का नहीं। डरने का नहीं। बोले तो पैनिक होने का नहीं और सुसाइड तो बिल्कुल नहीं करने का। अभी पलटी मारा है तो एक और पलटी और फिर सब ठीक...हम सबको पैसा बना के देगा। लेकिन उसके वास्ते इंतज़ार करने का। अरे काली शर्ट वाला साहब, आप क्यूं रोता है आप तो पहले दस का पच्चीस बनाया था। अब पच्चीस का दो रह गया तो हमारा मिस्टेक थोड़े होने का।
अभी का लिए घर जाके, चादर तान के सोने का। नींद में मौत आसान बन जाती है, उस्ताद बोलता है।

2 comments:

  1. हमेशा ही तेरे पोस्ट पसंद आए हैं.. और तारीफ़ की है..इसलिए लिखते हुए थोड़ा अजीब लग रहा है.. लेकिन अब तक का सबसे कमज़ोर पोस्ट लगा ये मुझे। शेयर बाज़ार के उछलते कूदते हालात देखते हुए ये विषय तो काफ़ी सामयिक लगा लेकिन लेखन में कमज़ोर। उस्ताद और जमूरे का इस्तेमाल नया था पर पूरे पोस्ट में एक पाठक को बांधे रखने लायक कुछ लगा नहीं.. अगले पोस्ट से धमाल की उम्मीद रहेगी।

    ReplyDelete
  2. हम तो यही कहेंगे- जाके पैर न फटी बिवाई वो क्या जाने पीर पराई।

    ReplyDelete

आपकी टिप्पणी से ये जानने में सहूलियत होगी कि जो लिखा गया वो कहां सही है और कहां ग़लत। इसी बहाने कोई नया फ़लसफ़ा, कोई नई बात निकल जाए तो क्या कहने !