Saturday, September 19, 2009

शशि थरूर- जो किया नहीं उसकी सज़ा


अब तक अख़बार और टीवी ही बरस रहा था, अब अपनी ब्लॉग की दुनिया भी थरुर की जान के पीछे हाथ धोकर पड़ गई है। जानते हैं,शशि थरुर की ग़लती क्या है- महज़ इतनी कि वो बेचारे अभी सरज़मीं-ए-हिन्दुस्तान की सियासी मिट्टी में ढंग से लोट नहीं लगा पाए हैं। इसलिए हमारी राजनीति के तौर-तरीक़ों से वाक़िफ़ नहीं है। मैं न तो थरूर का प्रवक्ता हूं और न ही उन्हें बहुत क़रीब से जानता हूं। सवाल बस ताज़ा विवाद पर उठाना चाहता हूं। पता नहीं जो थरूर पर बरस रहे हैं उनमें से कितने ट्विटर पर हैं और कितने उसके इंटरफ़ेस से परिचित हैं। मुझे क़रीब 8 महीने हुए हैं ट्विटर पर और लगभग इतना ही समय थरूर को फ़ॉलो करते हुए।
मोटा-मोटा समझिए तो ट्विटर पर आप जो लिखते हैं उसे ट्वीट कहा जाता है और आपके ट्वीट पर कोई जवाब दे सकता है या कुछ पूछ सकता है। इसके अलावा आप ट्विटर पर मौजूद लाखों लोगों में से जिसको चाहें फ़ॉलो कर सकते हैं यानी उनके ट्वीट्स आपके होमपेज पर नज़र आएंगे।
अब सुनिए, एक साहब हैं कंचन गुप्ता। चंदन मित्रा वाले अंग्रेज़ी अख़बार- पायनियर के असोसिएट एडिटर हैं। उन्होंने शशि थरुर से पूछ लिया-
# @ShashiTharoor- Tell us Minister, next time you travel to Kerala, will it be cattle class?
11:57 PM Sep 14th from TweetDeck in reply to ShashiTharoor

इस पर थरूर का जवाब था-
# @KanchanGupta- absolutely, in cattle class out of solidarity with all our holy cows!
12:17 AM Sep 15th from web in reply to KanchanGupta

ध्यान दीजिएगा कि कैटल क्लास शब्द थरूर ने इस्तेमाल नहीं किया है, ये महज़ जवाब है उस सवाल का जिसमें कंचन ने ये इस्तेमाल किया है। अब आप इसे आराम से मुद्दा बना सकते हैं कि थरुर को तो कंचन की बात का विरोध करते हुए ये लिखना चाहिए था कि ये आप क्या कह रहे हैं। इकॉनॉमी कोई कैटल क्लास थोडे ही होती है। आपने क्या देश के आम आदमी को मवेशी समझ रखा है। लानत है आप पर, वग़ैरह, वग़ैरह...लेकिन जैसा मैंने शुरु में कहा- अभी इस सियासी रज में लोट नहीं लगाई है सो बेचारे यहीं मात खा गए। लिख दिया- ज़रूर सफ़र करूंगा-मवेशी क्लास में, पवित्र गायों के साथ अपना सहयोग दर्शाते हुए।
अब कांग्रेस भी बिफर पड़ी ये सुन के। आप ग़लत समझे, सच पूछा जाए तो कांग्रेस कैटल सुन के थोड़े ही भड़की है वो तो Holy Cows को नहीं पचा पा रही। ऐसे कैसे कोई सोनियाजी और राहुलजी की यात्राओं का मज़ाक उड़ा सकता है-असल तकलीफ़ ये है। बाक़ी कैटल-वैटल जिए,मरे उसकी बला से। कांग्रेस का पैग़ाम साफ़ है- Holy Cows पर हाथ नहीं डालने का, क्या ! इस पूरे प्रकरण में मुझे, कम से कम यही लगता है कि थरूर की टिप्पणी एक सवाल का सहज, हास्यपूर्ण जवाब था, उससे ज़्यादा कुछ नहीं।

बाक़ी, इस पोस्ट के जिन पाठकों ने रेल की जनरल बोगी में सफ़र किया होगा, वो जानते होंगे कि असल कैटल क्लास क्या होता है। एक बात और। हम जनरल बोगी में कोई जानबूझ कर सफ़र नहीं करते- तब करते हैं जब या तो रिज़र्वेशन नहीं मिलता या इतना पैसा नहीं होता। जहां हम अभी भी सैकड़ों रेलगाड़ियों की हज़ारों जनरल बोगियों में लकड़ी की सीट पर दो इंच फ़ोम नहीं लगा सके वहां किस क्लास की बात कर रहे हैं।

कम से कम ब्लॉग की दुनिया में शशि थरुर के बहाने बहस इस बात पर होती कि हमारे यातायात के तमाम साधनों में किस क़दर क्लास बना दी गईं हैं और आम आदमी की औक़ात जानवर से ज़्यादा नहीं समझी जाती तो मुझे भी लगता कि ब्लॉग की दुनिया वाक़ई अलग है। लेकिन हमने तो अख़बार और टीवी की नकल ही की।

लेकिन उम्मीद है कि अगली बार कोई बहस अपने अंजाम तक पहुंचेगी और दूर तक देख सकेगी।

8 comments:

  1. नेता लोगों को नींद में भी मज़ाक़ नहीं करना चाहिए. हम लोग साफ़गोई के पैरोकार नहीं हैं ... हमें बस हिप्पोक्रेसी पसंद है.

    इकोनोमी क्लास में चलने वाले कुछ हज़ार भारतीयों को हज़म नहीं हो रहा कि एक नेता की हिम्मत कैसे हुई उनकी तुलना उन करोड़ों भारतीयों से कर दी जो जानवर से भी बदतर हालत में जी रहे हैं.

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  2. अच्छा तो ये बात थी...?
    शुक्रिया।

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  3. जो आपने बताया वो सही है। शायद शशि थरूर अब तक ये समझ नहीं पाए हैं कि यहाँ भावनाओं को भड़कने में वक़्त नहीं लगता है। जहाँ तक बात है ट्रैन की जनरल बोगी या फिर इकोनॉमी क्लास में मज़बूरी में सफर करने का तो ये समझ लिजिए कि अगर कोई और टिकिट का पैसा दे रहा हो तो जनरल वाला भी एसी फ़र्स्ट क्लास में सफर करेगा। नेता अपनी यात्रा का पैसा ख़ुद नहीं देते हैं और यही हमें परेशानी है। शशि थरूर अगर ख़ुद के पैसों से यात्राएं करें तो वो किसी भी क्लास में करें किसी को कोई परेशानी नहीं होगी। लेकिन, हमारी कमाई से जुटे टैक्स से नेता करें मौज और हम चले जनरल में ये तो ग़लत होगा।

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  4. माफ़ करना दीप्ति, लगता है बात ठीक से पहुंची नहीं। जनरल बोगी का ज़िक्र करने का मतलब ये बताना था कि किस कदर आज़ादी के इतने साल बाद भी हम अपनी गाड़ियों में ये छोटा सा बदलाव नहीं कर सके शायद इसलिए कि ग़रीब को ये एहसास बना रहे कि वो ग़रीब है- यही दु:ख की बात है।
    राहुल गांधी पर हमले के बाद तो आईबी ने ख़ुद सरकार को चेताया है कि फ़िलहाल अपना सादगी सफ़र बंद करें। वैसे भी सिर्फ़ 'Tokenism' से बात कहां बनती है। उसके लिए तो गहरे तक उतरना होगा और वो इन लोगों से होने से रहा।

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  5. थरूर नहीं, तरूर
    http://groups.google.com/group/technical-hindi/msg/9f6fe491a755169c

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  6. I agree with you. really nice blog.

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आपकी टिप्पणी से ये जानने में सहूलियत होगी कि जो लिखा गया वो कहां सही है और कहां ग़लत। इसी बहाने कोई नया फ़लसफ़ा, कोई नई बात निकल जाए तो क्या कहने !